मिताक्षरा सटीक आचार्यध्याय | Mitakshara Satik Acharadhyaya Ka Mulsahit Bhasha Anuvad

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Mitakshara Satik Acharadhyaya Ka Mulsahit Bhasha Anuvad by दुर्गाप्रसाद - Durgaprasad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मिताक्षरा स० आचाराध्याय का सचीपत्र ॥' रा, सन फट हि इलोक (दान श्लोफ 4 आशय प्रयोजनीक मूल ४ आशय प्रयोननोक मूल ही भेद मांसादि द्रब्यंके ग्राद्धों को विद्यार्यीती भिदयारत्ति ॥ हे रह (० अपेत्षा में पृसस्त्य की व्यवस्था॥| # महददागणपत्यादिफलपः ॥ र८३ 1 च्रेर मनचियोंक लब॒ण राज्यक्ा दिदार उपधाशोधन ॥ ३११ | ऐ० मस्त को रहा मन्त्रों का भेद नहीं प्लोनेदे ॥ ३४३ अरे र (य) योगीष्यर याच्गरल्कयसे कऋषियाँ ने घममे धक्का ॥ * ९ र गोगीशरने फाले झगणाले देध में बालादियें ॥ २ चियिर ग्ोगोयी आदि धूंती फा सगे नहीं करना 7 न्‍ घानफाल शोर यानऊ सम्बन्ध थे एंयाक्त छे गृणोंके भी काल ॥ | ३४० याच्पल्प्थी यशास्त्रकों परिभाषा उत्तम सध्यम ग्रधम देष्ड ३४ | ३९५४ (२) रामा के स्थाभाषिक्ष सचण | ३०८ से आरोरफ ॥ है 3१० तक राजाकों भ्राश्योथिक्रों आदि ३०७८ से विद्याओं का सयद्द करना ॥ * इरेग्ठक राजा को दुयदायफ व्यसन छठारद ₹८॥ ढ़ न्‍ राजा फो सप्माग राज्य को रखा करनी ॥ हः का दाभाका निषाएस्यान - दुर्ग । है३३ | ० । ३३ जिर्माण -. अध्यदों के लरण ४ रणसप्मयिक घ॒र्मा, व (० | + राजा को घाठों प्रदर के घन्धे | ३०६ रे | ०० [३२९ छे दे और चारों फा भेजना - दूत | इश्श्तफ पे या चारों के छ्त्तण ॥ राजाका स्पभाष ओरे प्रजा को। ३३३ से | ऐं० | ३३३ से रदा आदि पालन विधि थे इ३६गफ़ ३३६तक राजाश चयाय - प्रजा पौड़ा | ३३८ से | में० | ० राज्यशलन का फल ॥ दृष्ट१शफ | राजनीति पट्मणर्सान्धोरेपद्द आदि इ४९ | छे० | ७» (य) डदेशिधमियादल्प्रयामघादि 3 | , ९६ का जाई वेद पढ़ने को अष्रधि बानों वर्ण को ॥ * रण भो विद्याओं का नित्य पाठ करने के फल ॥ पियाह करना पर ऐसी स्वोसे करना ॥ परके ऐसे लद॒थ दो तिसकों कन्या देना ॥ पिध्ाइ में दिये और चाये हुये पद चिथेश| २ |० घनरा चर्चा .. पर परोता ॥ ह जप प्रियाद् फरनेफे देत तोनि # हा ५ 9६ [० पिषाद्दो के अनुक्ल्प पहिली है रंगों के अनुसार ॥ ३०१ ब्रिदेश| १० 1० पिषाद्देके आठ भेर ब्राह्मआदि | १८ से | +% के एनसपकि लद॒ण और विधि ॥ | (२शक् घ्यभिचारिषीक्राथधिशरदरना| ४० है। व्यभिचारसेशदिओऔर गर्भयेत्याग॥| ८३ शिँ३| ९ ० जिपाद फरनेफ फल श्वियोँ फो रहा > सेव | ष्द 9 बर्ण सकर प्रतिलोम छातों फो उत्पत्तिसत चैदेस्टिफ ध्यांदि ॥ ईई 9 व्जि1 फर्म परपाक् रुचि आदि दसका थ्रिचार # है है कह३ के कि बेद पठनेफरीमर्यादें ग्रोरसमय॥| १४ + कक बिका इतने ऊन्‍्ने को घोढदे आशा ब्गई # ४ झ (ह विद्यादिद्ीनफोप्रतिएदचइ लेना॥| २०१ इ०्१ ० बिद्यादान सब दानों या फल देता ह ४ श्र शहर शृदि श्रादुक्तों झसस्‍त विधि ॥| २४८ ३२१६ विघनऊारक देगविंधने'फेशारण४॥ २६० घए+० 1० फिघनज्ञपक्र शत - जिएतां फे | २०१ से फ अासानेपाले स्पय ४ अध्शतर पिशुनज्ञापक प्रायउदेतु - बा| सुप्श्से है एा अषस्या में 8 [7६4 लेक विपनशान्तिक लिये विनायर। २६६ से के | खपन आद्सध्कम ॥ न्टावज् विपूतशातीकट्रयोस्कम' हे शब्द इ८१ (० विक्मा्व घनदान शा फस 1 राप्मे मरत हे र्शे छान




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