षट्खंडागम द्रव्यप्रमाणानुगम भाग - 3 | Shat Khandagam Dravya Pramananugam Bhag - 3

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Shat Khandagam Dravya Pramananugam Bhag - 3 by हीरालाल जैन - Heeralal Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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व सत्कर्मपचिका परिचय ५९ इस ग्रकरणके मिछानके लिए हमने वीससेन स्वामीफे धवलान्तर्गत निबन्धन अधिकारका निकाठा । वहा आदिम ही निवधनके छह निक्षेपॉफा कपन विधमान है. और उनमें तृतीय दब्य- निक्षेपरा कपन झब्दश ठौऊ पही है जो पजिकाकारने अपने अर्थ देनेंस ऊपरकी पक्तिमें उद्धृत किया है और उसीका उन्होंने अप कहा है| यया-- णिडंधणेति जाणियोयदरे णिवधण ताव अपयदुणिररधगणिराकृरणद्ट णिव्खिवियब्व | ते जहा- णामणिवधण, ठवणणिवधण, दृग्वणिबधण, खेत्तणिबधण, कारूणितधण, भावणि्रंघण चेदि छरिवद्ध णिबधण होदि। इसके पश्चात्‌ नाम और स्थापना नित्रधनका स्वरूप बतछाया गया है और उसके पश्चात्‌ द्रब्यनिवधनका वर्णन इस प्रकार है- न ज दुम्ब जाणि दुब्वागि अस्सिदूण परिणमदि, ज़स्स या सदस्स (द्व्यस्स ) सद्दाथो दृष्पतरपंडिबद्धों त दृष्व्रणिबरधय | (घवछा के प्रति, पत्र १२६० ) प्रतिमे “ सदस्स ? पद भरुद्ध है, बढ़ा * दन्वस्स ? पाठ द्वी द्ोना चादिए | यद्दां वाक्‍्यके ये शब्द “ जर्स वा दब्बस्स सद्यायों दब्यतरपड़िबद्धों ! टौक़् वे ही हैं, जो पञिकार्मे भी पाये जाते हैं, और इद्दी शब्दोंका पजिकाकारने *एत्य जीवदब्यस्स सद्दायों णाणद्सणाणि ? आदि वाक्योंमें अर्थ किया दै । ययार्यत जितना वाक्यांश पनिकामे उद्घृत दै, उतने परसे उसका शर्थ व्यवस्थित करना कठिन दै। कितु घप्रलाके उक्त पूरे वाक्‍्यकों ठेंखनेमात्नसे उसका रहस्थ एकदम खुल जाता है। इसपरसे पजिकाकारकी शैडी यद् जान पडती है कि आधास्रन्थंके सुगम प्रकरणको तो उसके अस्तिलकी सूचनामात्र देकर छोड देना, ओर केवढ कठिन स्पर्लोका अमिप्राय अपने शब्दों समझकर और उसी पिल्सिदेमें मूठके वियक्षितपदोंको लेकर उनका अर्थ कर देना। इस्त परसे पंजिकराकारकी उस प्रतिज्ञाका भी स्पष्टीकरण द्वो जाता दे, जहां उन्दोंने कहा है कि * तस्साइगमीरत्तादों अव्यविसमपदाणमस्ये थोरद्धयेण प्चियसरूवेण भणिस्पामों ! भर्षात्‌ उन अठारद अनुयोगद्वारोंफा विषय बहुत गद्दन होनेसे हम उनके अथ्ेकी दश्सि तिपमपदोंफा व्याए्यान करते हैं, भौर ऐसा करनेमें मूलक केवल थोडेसे उद्धरण ढेंगे। यही पचिकाका स्वरूप है। मूलप्र-यके वाक्योंकी अपनी वाक्यरचनामें छेकर अरे करते जाना अन्य टीऊाग्रन्थेंमि भी पाया जाता है। उदा- हरणाये, विधानन्दिक्ृत अष्टसह॒स्रीम अकछकदेवक्ृत अष्टशती इसीप्रफार गुपी हुई है। पजिकाकी यह विशेषता है कि उसमें पूरे प्रन्यफा समावेश नहीं किया जाता, केवछ विषमपदोकों प्रद्ण कर समझाया जाता है। सन्कमैपचिकाऊ़े उक्त अवतरणके पश्चात्‌ शाक्षीजीने लिखा है-- /इस प्रकार छह्द द्रब्योंके पर्यायान्तरका परिणमन विधान विवरण दोनेके बाद निम्न प्रकार प्रतिज्ञा वाक्य है-- सपहि पक्रमाहियारस्स उकस्सपक्रमदब्दस्स उत्तप्पायहुगविवरण कस्सामो | त जहा-अप्यक्चवराण- भाणस्स उकस्सपशमदुब्व थोव | कुद्ों !” इत्यादि | को +




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