आत्मतत्वविवेक | Atmatattvaviveka

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केदारनाथ त्रिपाठी - Kedarnath Tripathi

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श्री मदुदयनाचार्य - Shri Madudayanacharya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १८) तदनन्तर राजा आदि सभीने साधु साधु कद्दते हुए उदयनाचार्यरी प्रशसा की। क्स्तु क्ाचाये ने कद्वा--इनका भी मत जब स्थित दी हे हो यदद मेरी प्रशसा कैसी! इसलिये अब जो मैं कद्दवा हूँ, उसे वौड्ाचार्य करें । ऐसा कट्द कर धौद्धाचायेझो क्या कि--मैंने आपके कथनानुसार कर दिया। किन्तु िसका मत सत्य हे और किसका मिथ्या हे ! इसके निश्चयके लिये जो में कद्दता हूँ , राजाके समझ्ष करें। यह अतिविशाछ तालछका यृक्ष दरवाजेपर स्थित है। उसपर बढ़कर दम दोनों ऊपरसे पिरें। “वेदाः प्रमाणम्‌” यद्द कद्द कर में और “चेदा, अप्रमाणम्‌ यह कद कर आप ऊपरसे गिरना । हम दोनों खाथ- साथ ताल्वृक्षसे गिरेंगे। दोनोंमें जो जीवित रहेगा, उसका मत सत्य होगा और उसे सभी छोग स्वीकृत करेंगे। उदयनाचायेफे इस बचन- को थौद्धाचाय्यने भी स्वीकार कर लिया। तब राजाने उन दोनोंसे क्या कि प्राणान्त करनेवाली यह परीक्षा ठीक नहीं हे । इसलिये आप दोनों इस विचारकों छोड़ दें। राजाफे इस बचनको सुमकर उद्यनाचायने कहा कि इसमे कोई दोष नहीं है । हम शाख्रके प्रति भक्तिसे अपनी रुचिसे ऐसा करेंगे और तुम्र भेरे या इनके किसी एकके सर ज्ञानेपर उसके मतकों छोड़कर जीवित बचे हुए के मतको स्वीकार कर लेना । ऐसा सुन कर राजाने बोद्धाचायेकी ओर देखा। उन्होंने भी ऐसा ही फद्दा। राजाने भी प्रतिज्ञा की। तब उदयनाचार्य एवं बौद्धाचाये दोनों उस महद्दावृक्षपर चढ़कर अपने-अपने मतको बोलकर प्रथिवीपर गिरे। उदयनाचाय “देदा प्रमाणम्‌” कह कर और बौद्धाचाय “बेदाः अप्रमाणम्‌” कद्द कर गिरे। डदयनाचारय वेदोंसे सुरक्षित द्ोकर बेद ओर दरिका स्मरण करते हुए प्रथिवीपर खड़े हो गये। किन्तु बौद्धा- चायेका उपरसे गिरते द्वी आणान्त हो गयां। यह मद्दान्‌ आश्वये देख कर राजा जादि सभीने आचायेको बार-बार नमस्कार कर उनकी प्रशंसा की। उसके अनन्तर राजाने वेदशास््रको सत्य मानकर उसे अपने शब्यमें स्थापित किया और चेदिक आचारमें निरत हो गये तथा राज्यके सभी बोद्ध उपासक आस्तिक द्वो गये ।




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