शब्द यात्रा पर है | Shabd Yatra Par Hai

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Shabd Yatra Par Hai by मुकुट सक्सेना - Mukut Saksena

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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शब्द याद्रा पर हैं 5 बिम्ब हमारे मेरे गाव कहा अब छप्पर ककरीट के घर है अलगोजो की धुन कहा हैं बन्दूको के डर हें रखी हुई हैं रिस्टवॉच मे बारूदी शकाए ठाणी ठाणी बनी हुई है रावण की लकाए राजनीति चौराहे पर हतप्रभ सी खडी हुई है आज अहिसा के काघो चढ हिसा बडी हुई है ऐसे मे करूणा से कोई कैसे ब्याह रचाए अब इन्सानी रिश्तो के मन रखे हुये पत्थर हैं। अविश्वास का धुआ जमा है पीपल के पत्तों पर चतुराई की दृष्टि टिकी है मधुमक्खी छत्ता पर नीलाथोथा पसर गया है केसर की क्‍्यारी मे कोई भींग नहीं पाता है अब आसू खारी मे ऐसे म ममता का कोई कैसे साथ निभाए जहा आस्था क पर टूटे बिखरे तितर बितर ह। विड्डी दल सा दूट पडा है भौतिक सुख जीवन पर जाने कितने बाण सघे हैं प्रश्नो के चिन्तय पर अपनी ही धडकन अब हम को भ्रम मे डाल रही है » अपने चेहरे की विकृति युशफहमी पाल रही है ऐसे मे अब कैसे खुद को दर्पण सम्मुख लाए जहा हमारे बिम्ब हमी से माग रहे उत्तर है।




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