छत्रपतिसाम्राज्यम् | Chhatrapatisamrajyam (historical Drama)

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ७) पुस्तक भी उन्होवे सम्कृत में लिखों घी। शुणराती मे भी एक आर « कृति 'मेवाडप्रतिष्ठा' है ॥ सस्कृत की नाट्येंक्तियाँ उनके संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्यत्व- काल ( १६२६-१६३३ ) म ही प्रकाश मे आ गयी भी | करमानुत्तार सन्‌ १६२८ से 'सथोगितास्ययम्वरण” १६२९६ में 'दप्रपतिसातन्राज्यम्‌ और १६३१ में 'प्रह्मपविजयम्‌' का प्रकाशम हुआ । भाठकों का सक्षिप्त परिचय निम्मलिणित है-- संयोगितास्पममस्वरमू--इसमे प्रसिद्ध हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान प्रौर राजकुमारी सपोगिता की प्रणय-क्था मिबद्ध है। घरपति* साम्राध्यमं--इसमें महाराष्ट्र केशरी छत्रपति शिवाजी के जीवन प्रौर घनके धौयंपूर्ए कार्यों एवं तत्कालीन यवत सप्नाद की दुर्नीति के विएद्ध संधप भौर भघ्रन्त में स्वराज्यस्थापना की घटताभो को श्रावद्ध क्या गया है। प्रत्ापविणयम्‌ -- जेसा कि नाम से ही ध्राभ्मात्तित है, इस नाटक मे भैवाड केदरी भद्दराणाप्रदाप सिह वा जीवन प्रसंग 3ल्लिखित है । यह भातिक जी दी नास्यश्तियों का संक्षिप्त परिचय है। प्रथ हम प्राये 'ृप्नपतिसाअ्राज्यम्_! पाठक के स्वरूप पर वाव्यधास्त्रीय सिद्धान्तों सथा सीमाप्नो को ध्यान में रखते हुए विचार करेंगे । सास्यस्वहप-मीमासा एब छब्रपति साप्राश्यम_ यह याज्िक जी की द्वितोय नाट्यकृति है। इसके पुव॑ं समोगिता« स्वयम्वरुंभ्‌' प्रवाशित एव विद्वानों द्वारा प्रशतित हो चुका था। प्रतत इस दितीय कृति वी उत्कृष्टता बे! विषय मे सन्देह नही कथा जा सकता । सर्वप्रथम हम वास्यथास्थ्रियों द्वारा विरूफित साअ्य सक्षझों पर विचार करें--भदस्यानुकृतितास्थम्‌ (दशरूपक--१)--प्रवस्था को प्रनुकृति को नाव्य कहते हैं, दृश्य होने के कारण इसे रुप भी कहते हैं, रूप का झारोप हो जाने से 'रूपक! भो इसकी सज्ञा है, भौर रस के भाश्नंय से होने याले दस भेद हैं। दश्रूपककार के प्रनुसार वे दह्त




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