सूक्ति - संग्रह | Sukti Sangrah

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Sukti Sangrah by मुनि श्री लक्ष्मणविजय - Muni Shri Lakshmanavijay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ल्‍्न्ी जीवदया जिणधम्मो, सावयजम्भो गुरूण पयभत्ती । एश्र रयणचउबक, पुण्णेहि बिणा न पाचन्ति ॥४॥- जीवदया जिनधर्म , श्रावकजन्म गुरूणा पदभक्ति एतद्‌ रत्नचतुप्क, पुण्येविना न प्राप्नुबन्ति ॥५॥ , झापय - न ४ गा जी जीवदया जिनधर्म श्रावकजन्म, ग्रुरगाम्‌,। पदभक्ति, एतत्‌ रत्न चतुप्क (जना ) पुण्य, विना न प्राप्नुवैन्ति + सक्षिप्त प्याए्या ५ ' जीवेपु, प्रासििपु दया कृपा, जिनस्य धर्म श्रांवकस्य जैन धर्म पालव स्य जन्म, गुरुणाम्‌ पचरमहात्रतपालका- चार्यादि पूज्य पुम्पाणाम्‌ पादयो चरणयो भक्ति एतत्‌ (उद) रत्नानाम्‌ चतुप्कम्‌ सत्नचतुप्ट (जना- नरा ) पुण्य. सत्‌ कर्मभि बिना न प्राप्नुबन्ति लभन्ते। झर्प -+ जीबो पर दया, जैनवर्म, क्षागक बुल मे जन्म, 'गरजनों है के चरणों मे भक्ति ये चारो रत्न मनुष्य पृष्यो कक ! बिना प्राप्न नहीं कर सबते हैं ९




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