उतराध्ययनसूत्रम् | Sanskarti Aatam Gyan Utradyayan Sutram Part -1

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ७) प० तं० अटिमंसं, सोणिते, असुतिसामंते, सुसाणसामंते, चंदोवराते, सूरोवराते, पडणे, रायबुग्गहे, उवसयस्स अंतो ओरालिए सरीरगे ।” स्थानांगसूत्र स्थान १० सू० ७१४ (छाया) दशविधम्‌ आन्तरीक्षकम्‌ अस्वाध्यायिक प्रज्ञप, तद्यथा--उल्का- पात।, दिग्दाह।, गर्जितं, विद्युत्‌, निर्धात), यूपक!, यक्षादीपे, धूसिता, संहिता, रजउद्घातः | दशविधः ओऔदारिकः अस्वाध्यायिक! प्रज्यप्त), तथथा--अस्थिमांस- शोणितानि अशुचिसामन्त श्मशानसामन्तं चन्द्रोपरागः ख़रोपरागः पतन राज- विग्रह। उपाभ्रयस्यान्ते औदारिक शरीरक्म्‌ | तथा च पाठ।-- “जो कप्पतिनिग्गंथाण वा निः्गंथीण वा चउ॒हिं सहा- पाडिवएहिं सज्कायं करित्तए, तं जहा--आसाढपाडिवए, इन्द- महपाडिवाते कत्तिएपाडिवए, सुगिम्हपाडिवए, णो कप्पइ निर्ग॑- - थाण वा निग्गंथीण वा चउ॒हिं सज्काहिं सज्ञायं करेत्तए, त॑ पडिमाते पछिमाते, मज्कण्हे, अहरत्ते, कप्पइ्ट निग्गंधाण वा निग्गंथीण वा चाउकालं सज्कायं करेत्तए तं०-पुष्वण्हे अब- रण्हे पओसे पच्चुसे 2 स्थानांगसूत्र स्थान ४ उद्देश २ सू० २८८ ( छाया ) नो कल्पते निग्नेन्थानां वा निग्रेन्थीनां वा चतु्ि! महाग्राति- पह्ुः स्वाध्यायं कत्तुम्‌ | तद्यथा--आपाढीग्रतिपद), इन्द्रप्नतिपदः, कारत्तिकप्रति- पद, सुग्रीष्मग्रतिपद! १ नो कल्पते निर्ग्रन्थानां निग्रेन्थीनां चतुसि! सन्ध्याभिः स्वाध्यायं कर्त॑म्‌ | प्रथमायां पश्चिमायां मध्याह्दे अधेरात्रो | कल्पते निग्नैन्थानां निर्नेन्थीनां चतुष्काले स्वाध्याय॑ कर्चुम | तद्यथा--पूर्वाह्ले, अपराह्ले, प्रदोपे, प्रत्यूपे। भावार्थ--आकाश से संबंध रखने वाले कारणों से आकाशसंबंधी दश प्रकार से अस्वाध्याय वर्णन किये गये हैं | जेसे उल्कापात ( तारापतन ); यदि महत्‌ तारापतन हुआ हो, तो एक प्रहर पर्यन्त शाख्रों का स्वाध्याय नहीं करना चाहिए १ | जब तक दिशा रक्त वर्ण की दिखाई पड़ती रहे, तव भी शास्त्रीय




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