स्वर्ग एक तलधर है | Swarg Ek Taladhar Hai

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Swarg Ek Taladhar Hai by उपेन्द्र नाथ अश्क - Upendra Nath Ashak

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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आम आदमी का दुभग्य केवल यह है कि वह घर्म के सार को छोड़ कर उसके फ्रॉर्म को, रप को, पकड़ लेता है। आम आदमी स्वभावतः लीक पर चलने दाला होता है। घर्म के उपरी रप को अपवाना-यज्ञौपवीठ पहनना, चोली रखना, मन्दिर जाना, पूजा-प्रार्था करना, ्रत-उपवास रखना, गंगा-स्नान करके अपने पाप धोना और सोदना कि स्वर्ग में जगह सुरक्षित हो गयी है---उसके लिए सहज है। धर्म के सार को पकड़ कर अपने जीवन में उतारना चूँकि कठिन दोता है, इसलिए वद सरल मार्ग चुन सेता है। आम लोगों की इसी कमजोरी का लाभ घ॒र्माचार्यों और सियासददानों ने सूब उठाया है। स्वर्ग का लालव दिखा कर दुनिया मर में उन्होंने अपने अनुयागियों को अन्य धर्मादलम्दियों के स्िलाफ़ मड़का कर इतना रक्‍्तपाते कराया है कि इतिहास के पन्ने स्रून से काले पड़ गये है। दिलचस्प बात यह है--इस बात को मानने के बावजूद कि वह अपरिगय सत्ता (उसे भगवान कह लें या सुदा) सब जगह विद्यमान है और घर में बैठ कर भी उसका ध्यान किया जा सकता है, विभिन्‍न धर्मों ने दूसरों से अपने आपको विलग करने के लिए अलग-अलग पूजा-स्थल दना कर उस असीम को सीमा में बाँध रखा है। मावान को गाली दे दो, उसकी सर्वश्रेष्ठ रघवा-मनुप्य--की हत्या कर दी तो किसी के कान पर जूँ नहीं सेंगती, लेकिन आदमी द्वारा बनाये गये इन पूजा-स्थलों की जरा-सी बेहुर्मती स्रून की नदियाँ बहा सकती है। मैंने शास्त्र भी पढे हैं, कुरान मी, गीता और ग्रन्थ साहब मी। मैं जिन्दगी भर बहुत परेशान रहा हूँ। कुछ प्रश्न भुझे जीवन भर सताते रहे हैं। कुछ प्रश्नों के समाधान मुझे मिले और सन्तुप्ट कर गये हैं। सामाजिक और धार्मिक--दोनों छोरों पर मैंने उनको अपने जीवन में उतार कर देखा है और सही पाया है। इसलिए मैने अपने इस कथा-काव्य में उन्हें पाठकों के सामने पेश कर दिया है। (मूमिका से)




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