उपदेश प्रसाद भाषांतर | Updesh Prashad Bhashantar Vibhag Part 1

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Updesh Prashad Bhashantar Vibhag Part 1 by श्री विजय लक्ष्मी - Sri Vijay Laxmi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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््र्‌ थता हता. आ चरित्र खास वांचवा ज्ञायक छे, व्याख्यान 9१ए मां विजय शेठ ने विजया राणीनी जेवाज थयेत्षा बीजा महा पुरुष--अपू्वे ब्रह्मचारी जिनदास ने सानाग्यदेवीनु टंकु चरित्र आपेल्नु के के जे दंपतीने जपारुवानुं फछ झ्षाख साधर्मी बैधुन जमारूवा जेटल्रुं श्री गुरु महाराजाए कहेल्ुं के, व्याख्यान ४४० मां कपिन्न के वलीतु चरित्र खास ब्लोनहझख्थिने अंगे बांचवा योग्य के, व्याख्यान ४४ मां था- चद्चापुत्र, झुकाचाये ने सेल्नकाचायसु चरित्र छे, तेमां थावच्चापुत्र आचाये ने शुक पसिा- जकनो संवाद खास वांचवा ज्लायक के, व्याख्यान एशए थी 7१४ ना चार व्याख्या- न पांच कारणोनी सिझ्ििना संबंधनां के, ए जरुर वांचवा योग्य के. ए वांचवाथी कमे, लद्यम के जावीनाव विगेरेनों एकांत पक्त निशास पामी कोट पण् कारये पांच कारणों व- मेज सिख्छ थाय छे, एम हृदयमां ठसी शके के, व्याख्यान 9३३१ मां विषानोनी वाणी- नो विज्लास वांचवा ह्लायक के, तेनी अंदर निगुणी पुरुष तुच्छ लपमाने पण योग्य नथी एम सिद्ध कर्यु छे, व्याख्यान ए३१०-३७-४० मां 9७ मा छ मा ने ए! मा ए त्रण निहवो ( गोष्टामाहिल्न, दिगंबर ने ढुंढकमति ) नां चरित्रों उत्पत्ति बिगेरे छे, लपरांत व्याख्यान ५६४-२६३-४५६० ने ५६ए मां ३ जा, ६ हा, ऐ मा ने ४ था निहव- नां चर्त्रो क्षे, ते दरेक वांचवा ज्लायक के, फक्त पढेल्ा ने बीजा निहवनी कथाज आनी अंदर नथी, साते निहवनां नाम विगेरे व्याख्यान २६४ मां आपेक्मां के. व्या० ख्यान २४१ थी 2४० चार कषायो जपर के, तेनी अंदर ते ते कषायोयी छःख पा- मेल्ला अमरदत्त ने मित्रानंद, वाहुबल्लि,: अपाठनूति अने सागर श्रेष्ठी तथा सुनूम च+ क्रीनां रष्टांतो छे, व्याख्यान 7४९६-४७ ने ४३मां क्रोधापैंझ, मानपिंझ, मायापिंम ने झो। जपिंम मुनिने अग्राह्म के एम सिझ्छ करी तेनी लपरनां दृष्टांतो आपेक्षां के. ] न ३४६८ मामां छ प्रकारना ख्लीने आधीन पुरुषोनुं स्वरूप बताववामां आव्युं छे, ते वां चवा त्ञायक छे, व्याख्यान ५४० ने शध्वाएं दश प्रकारनां प्रत्याख्यान संबंधी छे, प्रत्याख्याननी शुख्धिना इच्छक बंधुओए खास वांचवा त्लायक छे. व्याख्यान १०२३ मिथ्यात्वेना तमाम जेदोल स्पृष्टिकरण करेल्युं छे, मिथ्यात्वने विषवत्‌ सपजी तेंने त; जवा एच्छनारे आ स्वरूप खास ध्यानमां राखवा ल्लायक के, व्याख्यान १९६ मार्थ ६ कानाचारादि आचारोज स्वरूप शरु करवामां आव्युं के, पाठलना बने स्थंन ( ! व्याख्यान ) ते संवंधीज के, तेमां पण हज्ु क्वानाचार, दशेनाचार ने चारित्राचारल रूप पूएे अविल्ल॑ छे, तपाचारूुं तो अधुरु क्षे, ते हवे पत्तीना विनागमां आवनार ढे, [ः




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