वनस्थली | Vanasthali

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Vanasthali by नम्र - Namra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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धनस्थली रहे आदि मध्यावसान में चरण-कमल . का ध्यान 3 क्वणन, रणन-स्वन॒ पर वौणा के हो मन-मृग का मान ना-ब्रहा-स्वरूप। हो ता , े मेल, निगृण-रूप 3 _ ज्ञान-छटा बन प्रकृति दिखाती व्क्य्क शश्वत्‌ू नम्न-निमित सरस्वति करती जी । का करती कक आत्म-विनिर्मित विश्व-विपिन में करती. स्वच्छ विहार घट-घट में ही संव्यापक हो देती प्रभां प्रसार । कक




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