चित्रावली | Karikavali With Sidhantmuktavali Of Vishwanath Panchanan Bhattacharya Chitravali

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Karikavali With Sidhantmuktavali Of Vishwanath Panchanan Bhattacharya Chitravali by श्री चंद्रधारी सिंह शर्मा - Shri Chandradhari Singh Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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व्र० खशठ-का० २, पदार्धनिरुपग । जे अ्रतिरिक्त पदार्थ दे 1 ( ६ ) घद साटश्य ई भाव पदार्थोफे प्रन्‍्तर्गत नहीं दे। फ्योंकि जातिमें छे भाष पदार्पान्तगत एक भी पदार्थ महीं रएता दे किन्तु सावश्य रहता है इसलिये एक आर साटदश्य नामका भाष पदार्थ मानना प्रभ्यदित है। (२० ).जैसा गोत्य नित्य है घेसा अश्वत्य भो नित्य हैं। इस रूप से ,ध्श्यत्व में गोत्य के साहश्य को प्रतोति होती है। इससे सादश्यमें जाति घृत्तित्यको सिद्धि हुई। श्रतएुव “साइश्य म द्वव्यादिभावषद्कास्तगतत आतिपृत्तित्वात इस पघ्जुमान में स्वरुपासिद्धिदोप मददीं छगा। (११) साहश्य ध्भाव पदार्थके प्रन्तर्गत भो नहीं हैं; फ्योंफि उसकी प्रतोति भायरुपदौस द्वोती है ( अ्रभावकी प्रतोति तो घेसी महींदे )। हे (१२) मयपाद्यमभावविशिष्टवहपादेदाहा दिक॑ प्रति स्वातन्न्येण मणप- भावादेरेव या हेतुत्व करप्पते । (१३) अनेनेय सामण्जस्ये अनन्तशक्तितत्या- गभावध्वेसकल्पनानौचितद्यात्‌। (१४) न चोत्तेजके सति प्रतिवन्‍्धकसदभावे5पि कथे दाह हृति वाच्यम्‌ | (१५) उत्तेजफाभाव विशिष्टमयपभावस्य छेतुत्वात्‌। (१६) साहश्यमपि न पदार्थान्तरं किन्तु तद्डिन्नत्वे सति तद्ठतभूयोंधम- उत्वम्‌ 4 (१७) यधाचन्द्रभिन्नत्वे सति चन्द्रगताहुलादकत्वादिसित्वम्‌ मुखेचन्द्रसाइश्यमिति॥ .. ह (१२ ) ( शक्तिके पूर्वेपत्तका उत्तर ) चस्द्रकान्तमणि मन्त्र भौर जड़ी-बूटी इत्यादि से रहित प्रप्ति प्रथवा घन्द्रफान्तमणिका प्रभाव ध्ोर अप्नि ये दोनों स्वतन्ध रुपसे दाहके प्रति कारण दैं। ( १३ ) जब उक्त कारणता की कद्पनासे दी निर्वाद्द ( उक्त व्यमिचारका घारण ) दो जांता है तथ प्रमनन्‍्त शक्ति, उनके प्रागभाव कौर ध्येल मानकर अनुचित गौरव फ्यों सहा करें? (१७) (पभ्र०) घन्द्रकान्तमांण जय प्रतिबन्धक है तब सूस्येकान्तमणिके साथ हो ज्ञाने पर प्ग्मिसे दाद्द कैसे दोगा? ( चन्द्रकान्तमगयभावरूप फारण तो नहों रदा )1 (१५४) (3० ) इसलिये सुय्येकान्तमणि रदित जो चन्द्रफान्तमणि उसका ध्यभाव दाह फे प्रति कारण है। प्रकतमें सूय्यक्रान्तमणिसे रहित चन्द्रकान्तमणि नहीं है। तव उसका अभाव रद्द गया । अतः शक्तिको न मानने पर भो दाह होनेमें कोई अज्भञपपत्ति न हुई। (१६ ) सादश्य भो अतिरिक्त पदार्थ नहीं दै किन्तु उससे भिन्न भर उस पर रहनेवाला धर्म ही सादश्य है। ( श्र्थात्‌ उपमान और उपमेय इन दोनों में रहनेबाला धर्म ही साहश्य दें। साधारण धर्म प्रयोज्यता उसमें न्दीं मानते हैं )1 ( १७ ) # जैसा कि चन्द्रमासे भिन्न फान्ताम्ुख है किन्तु चन्द्रमामें जो आहादकत्व ( सुख विशेष जनकत्व ) है चही मुखमें भी है । इसलिये शोह्वादकत्व से अतिरिक्त साइश्य नहीं है। यस्तुतः खुखच्त्यव्याप्यजाति ही यहां साइश्य है। उसको स्वावच्छिन्न ज़न्यता निरुपित जनकतावच्छेद्क प्रत्यक्तीय चिषयतावत्य सम्बन्धसे उपसेयोपमान साधारयणत्व है । डे ॥ इति सप्तपदार्थ सामान्य निरूपणम्‌ ॥ # का० (टि०) साइश्यात्मकघरस दो प्रकार के होते है। जातिरूप ओर उपाधिरूप। (१) जातिरूप +घट _सद्शः पटः। (२) उपाधिरूप 5 गोत्वम्‌ नित्यम तथा अश्वत्वमपि ।




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