आत्महित सुगुणावली | Atmahit Sugunavali

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Atmahit Sugunavali by गुलाबचन्द जी - Gulabchand Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(१५) अथ ८ चद्र॒प्रमजिनस्तवनम्‌ राग पीलू होजी हो जिनद हां मोयतोी भरासो राग चरनांसगे मोयतों आ० ॥ महासेनराजा तात त्रिंसलाद राणी मात तेहनू तु अगजात स्वेत वरणेरों ॥ १॥ तुमहों त्रियुवन नाथ कीजे साथ दीजे हाथ धरम परम संसार तिरणरों ॥ २॥ अरज करत एक प्रभुगारी राखों टेक तुम दस्सन सुद्ध आतम करणुरों ॥ ३ ॥ ते रहें आवीन लीन जलमे मग- न मीन चेदस्वाम नाम धाम दुःखके टरनंगे ॥ ४ ॥ करम भरम काप शिव सुख मोय-साप गलावचद आनंद शरणरोी | मो० ॥ ५ ॥ - , अथ ६ सुविधि जिन स्तवनम राम मल्हार सारठ प्रपयापाएं प्याज्ञारा दाण। न बाल प्रचाल तारा हो जिनजी एसमार असार | आ० सग्रीच नदन कुबुधि विहेंडन सुबावे सदा सुख कार। धनरा- मात गंगी जननी जाया सुत सुख कार ॥ १॥




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