अमितगति- श्रावकाचार | Amitgati-shavkachar

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Amitgati-shavkachar by भागचन्द्र जैन - Bhagchandra Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ग्रंथकत्तो । >> 4कि०- इस अधके सूल कत्तो माधुरसंघके भाचार्य अमितगति है। उक्त नामके दो आचार्य हुये ह। जिनसेसे एक तो मुंजराजाके शासनकाल विक्रससंवतकी $$ वीं शताब्ठीसे । जिन्‍्होने धर्मपरीक्षा, सुभाषितरत्नसंदोह, पंचसंप्रह तथा इस श्रावकाचार आदि अंथोंकी रचना की है। ये अमितगतति साथुरसं- पके लाचाय॑ साधवसेनके शिष्य थे इसबातका उछ्छेख उक्त जाचार्यप्रवरने प्रायः अपने सभी अंथोंसे किया है। इनकी विशेष प्रशस्तिका वर्णन सुभाषितरत्नसं- दोह, आदि प्राय सभी ग्रश्नोस है। इसलिए जिज्ञासु महो दयोंको वहांसे जानना चाहिये यहां विस्तारके सयले ओर सुभापितरत्नसदो हमे प्रशस्तिके मुह्रित होजानेसे विशेष वर्णन नहीं क्या गया है । दूसरे अमितगति जाचाये इन्हीं आमतगातैके गुरुके गुरु आचार्य नेमिपेणके गुरु तथा देवसेनके शिष्य हुये हैं।योगसार नामक जो अमितगति कृत अध्यात्मविषयक अंथ है उसके कर्ता शायठ ये ही अमितगति है। क्योंकि योग- सास्की शब्दाथरत्रना तथा धर्मपरीक्षादि अधोंकी रचनासे विभिज्नताके अति- रिक्त एक पुष्ट प्रमाण यह भी है कि धर्सपरीक्षादि अंधोमे साधवलेनके शिष्य अमितंगतिने अपने नामका उल्लेख प्रायः ससी अध्यायों परच्छेशेंके अन्तमें अन्य शब्दोके विभेषणरुपमें किया है। परन्तु योगसारके किसी अधिकारसे ऐसा नहीं है, सिर्फ़ एक अंतिम छोकमे अपना नाम स्पष्ट प्रकट कियाहै,--जैसेः-- इृष्टा सवे गगननगरस्वप्तमायोपमाने निःसंगात्मामितगतिरिदं प्राभृतं योगसारम । ब्रह्मप्रात्या परमकृत स्वेजु चात्मप्रतिष्ठ नित्थानंद गालितकालिल सूध्ममत्यक्षरुक्ष्यम्‌ ॥ इसके अतिरिक्त धर्मपरीक्षादि ससी ध्रधोंसे अमितगातने अपने शुरुका नाम स्मरण किया है परन्तु योगलारमे नहीं। इसलिये योगसारके कर्ता देवे- सेनके शिष्य जामैतगति ही होने चाहिये।




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