भोजप्रबन्धः | Bhojprabandh

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Bhojprabandh by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दर ज्ञोजप्रबन्धः । कंठस्था या भवेद्िया सा प्रकाशया सदा बुधे॥ या गुरो पुस्तके विद्या तया मूठः प्रवायते ॥8॥ कंठम स्थिव विद्या हो तो विदजनोंने सदा मकाश करनी चाहिसे । जो गुरु विपें और पुस्तक विष विद्या है उस विद्यासे मद जन निवारण किया जाता है ( रोका जाता है) ॥ ४॥ इति राजानं प्राह। ततो राजापि विप्रस्याहंभा- पमुद्रया चमत्तकृतां तद्ाता श॒त्वा भस्माक जन्मत आरभ्येतत्क्षणपय्यतत यद्न्मयाचारते यवत्कृत तत्सव वद्सि यदि भवान्सर्वज्ञ एवेत्युवाच। ततो ब्राह्मणोपि राज्ञा यब॒त्कृतं तत्सवंसु॒वाच गूठव्यापारमापि । तो राजापि सर्वाण्यप्यभिज्ञानानि ज्ञाला तुतोप। पुनश्च . पंचपट्पदानि गत्वा पाद्योः पतित्वा इंद्रनीरुपुष्परा- गमरकतवेडूयेसाचितासिहाक्षने उपवेश्य राजा ग्राह ॥ . ऐसे राजाको बोला। तंब राजाभी बाह्मणकी अहंका- रपनेकी मुद्राते चमत्कार की हुई तिस्त वावोकी सुनके ऐसे कहता भया कि हमारा जन्मसे लेके अबवक मेंने जो २ आवरण कियाहे जो २ काम किया है तिस संपूर्णकी यदि आप कहते हैं वो सर्वज्ञही (संपूर्णवेत्ताही ) हो। इससे अ- नंतर वह ब्राह्मणन्ती राजाने जो २किया था तिस संपूर्ण गुप्त व्यवहारकोीभी कहता भया । फिर राजाभी अपिज्ञानोंकी ( ब्राह्मणकी सर्वज्ञवाबों ) जानके प्रसन्न होता भ्या । फिर




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