स्वाध्याय संदोह | Sawadhyay Sandoha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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* ओऔोइ्म्‌ # दुद नम ऋषिभ्यः पृ्वेजेश्यः पूर्वेम्य, पथिकृदू भय: ॥| ऋ० १०१४।१५ प्रचएश्ड आतप था| आत्मा, मन, प्राण सभी कुलसे जा रहे थे | च्राण का स्थान कहीं न टीखता था । ताप शान्त करने को, आत्मा की प्राण दिलाने को, श्रनेक तीर्था में स्नान किया । किन्तु ताप न मिठ्ता था, न प्रिय, उलय बढ़ता जा रहा था| सभी उपचार बेकार हो रहे थे । निराशा-निशा ने श्रा घेरा था। प्रतीत होने लगा कि क्दानित्‌ ताप याप्य हो, जीवनसड्डी हो । मूछित होने को था कि नन्‍्दगोपाल ननन्‍्दलाल ने दयानन्द- सरन्‍्वती या तीर ठिखलाया । सरस्वती का नीर क्ञीर प्रतीत हुआ । सरस्वती-घारा श्रतीव शीतल थी, उज्ज्वल थी, पिमल थी | उसमे डुबकी लगाई। जान में जान औआाई । चकित हुआ । श्रमिठ ताप मिठ्ता प्रतौत हुआ । दया शीर आनन्द के सात म घनसार-मा सार था। फिर भा निकलने को था उस सन्तापद्ारिणी भवभयदहारिणा। समसारतारिणी तर्ण से कि दर्शनानन्द ने दिव्य दर्शन दिये श्रीर विमल सरस्वतत का, शौतल पावन सरस्वती का माइत्यम बताया । पृवभवीय नानाबिध वामसनाश्रों के कारण उसत्न्न हुई चपल चित्त की, चचलता के वर्शीभूत हय्रा यह मर, धराधाम से विश्वभर तक ले जाने वाली सन्तापद्वारिणी धार से निकल कर, ससार-अज्ञारा में लाट पोट दाने को था कि विष्युदत्त विशुद्धानन्द न इस प्रवाह की झआनन्दमयता, विशुद्धता तथा विधूषुपदता टिगलाई | श्रन्त मे ज्यानन्द ने श्राकर वजय-दुन्दुमि चजावा, दयानन्द का तौर्थ बताया। और दयानन्दती् पभ्साख | दयानन्द ने ग्रपन मूल डद॒गम तक-श्रनाद सरस्वान बंद भगवान्‌ तक पहुंचाया। बढ़ा पहुंच कर | झानन्द एभ, योगा से राय बह क्यॉयरि मनाया !




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