नेमिनाथ महाकाव्यम् | Neminath Mahakavyam

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Neminath Mahakavyam by सत्यव्रत -Satyavrat

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( २४ ) जो केसव पत्चहि पड्चेहि, पच्चद्भः पणमिय जादवेहि। सिय पच्चम नाण आराहगाण, सो हरउ दुरिय जिण सेवगांण ॥७॥ 1 चस्तु ॥ पढम नाणहि पढ़म नाणहि भेय अडवीस । चउदभेय सुय॑स्स तह अवहि नाण छब्मेय निम्मल । भणपज्जव नाण पुण दुच्चि भेय इग भेय केवल । एवं पत्च पयार मिह जेण परूनिय नाण । सो चदउ विरि नेमि जिण मज़ूलमय अभिहाण ॥5॥। ॥ भास ॥। पचासव तक्‍कर हरण, दिणयर जिम दीपति। घइ!दिदुठठ सिरि नेमि,जिण, हियय कमल विहसत ॥६॥ प सुट्दइ पच्च पयार मह, अन्तराय अन्धियार। पञ्चाणुत्तर भाव सवि, पयडिय हुई जगसार 11१०६ ,भवपुरि वसता सामि हुय, राग दोस मिलिएंहि। रयणदिवंस सतावियउ एु, पश्चिदिय च.रेंहि 11११॥ सिद्धि नयरि दिउ वास ' हिव, केरि पसाउ जिणराउ 4 पञ्चम गइ कामिणि रमण, वर पतच्चाणण ताय ॥१२॥ ( कलश ) सिवादेवि वदण पाव खडण चरण तारण पच्घलो $ हय कम्म रिउ बल सबल केवल, नाण लोयण [नम्मलो 4 सिरि नाणपच्रसि दिवसि थुणिइ, नेमिताह जिणेससे। आ्उ सिद्धि सपइ देव जपइ, कीर्तत्त राय समगोह से ॥1१३॥ 4 इति श्री नेमिनाथ स्तवनस्‌ 4 अमयनेन ग्रस्यालय प्रति स० ६६३५ पत्र-१ १७ वी शताब्दी लि०७ प० हीरराज लिखत । १६ वी क्षती के गग्रुटका रत्न मे भी है ।




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