अथ वेदांगप्रकाश [भाग 3] | Ath Vedangprakash [Bhag 3]
श्रेणी : साहित्य / Literature
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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
284
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)शजकारान्तः श्जअथ' नियतनपुंसकलिएह धनशव्द ॥|घन शब्द को पृथवत्् प्रातिपदिकसंज्ञा आदि काय द्वोकर 'घन-स
इस अवस्था में-- *
३६-अतोध्म् ॥ झअ० ७1 १1 २७४॥
अकारान्त अन्न से परे सु और अम् विभक्तियों के स्थान में अम्
आदेश दो । इस अम् करने का यहद्दी प्रयोजन है कि सु(१)ओऔर कम
का लुक पाता है सो न हो। धतम । घन--औ--
४०-नपुसकाच ॥ झअ० ७1 १1 १६ ॥
जो अकाशन््त नपुंसकलिड्ज से परे (२)ओऔड हो तो उसके स्थान
में शी आदेश हो । जैसे--धन-शी । श् की इत्संज्ञा होके--धन-ई ।
इस अचस्था मे (| “आदुगुणः' इस सूत्र से गुण होके -घलने।
घन-जसू-- न्
४१-जश्शसोः शिः ॥ अ० ७। १1 २०॥ *
जो नपुंसकलिज्ञ स्भातिपदिक से परे जसू और शस् विभक्ति
हो तो उनके स्थान में शि आदेश हो । जैसे--धन--शि ।
( $ ) “ख्मोनेपुसकात्” [ ना० ७० ] इस सूत्न से छुक् प्राप्त था।
(३२ ) 'कौढ? यह म्थमा और द्वितीया विभक्ति के ट्वितचन की
आचीन आचार्यों' की संज्ञा है ।1 इससे जागे सूगति इंस शकार समझनी चाशिये--नहंसकर्छिंगमे सुद् की सर्वभामस्थान संज्ञा न होने से यतिभम्र (चा»४७ ) से भरंक्षा होकर “यस्येति? ( स्त्रे० ८०६ ) से अकार रेप प्रासहोता है, उसका 'भीढः इयो मतिषेघः” (घा० ६1४1४) वार्तिक से निपेघ
होता दै, उसके पश्चाव:-- हञ्
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