सामयिक विधि प्रकाश | Samayik Vidhi Prakash

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Samayik Vidhi Prakash by जमनालाल कोठरी - Jamnalal Kothari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्री ज्ञिन दर्शन विधि। श्र विद्यमान हैं 'सब्बे! उन सबको 'तिविहेण” तीन प्रकारते अर्थात्‌ मन, चचन, कायासे 'चंदामसि' वन्द्न करता हूं ॥| भावार्थ--अरिहंतोंकी मेरा नमस्कार हो; जो अरिहंत, भगवान्‌ अर्थात्‌ ज्ञानवान्‌ हैं, धर्मकी आदि करनेवाले हैं, साधु साध्वो-आवक-श्राविका रुप चतुविध तोर्थंक्ी खापना करने चाले. हैं, दूसरेके उपदेशके सिंचाय ही वोधको प्राप्त हुए हैं, लब पुरुषों में सिंहके समान निडर हें, पुरुषों कमलके समान अलिप्त हैं, पुरुषोंमें प्रधान गन्धहस्तिके समान सहनशोल हैं, लोगोंमें उत्तम है, छोगोंके नाथ हैं, छोगोंके हितकारक हैं, छोकमें प्रदोपके समान प्रकाश करनेवाले है, लोकमें अज्ञान अन्धकारका नाश करने वाले हैं, दुखियोंकों अभयद्वान देनेवाले हैं, अज्ञानले अन्ध ऐसे. ठोगोंको शानरूप नेत्र देने वाले हैं, मार्गश्नएकों अर्थात्‌ गुमराह की मार्ग दिखानेवाले हैं, शरणागतको शरण देने वाले हैं, सस्यकक्‍्त्व प्रदान करनेवाले हैं, भर्महीनकों धर्म-दान करनेवाले हैं, जिशाखुओंकी धर्मका उपदेश करनेवांले हैं, धर्मके नायक-अगुए हैं, अर्मके सारथी-संचालक हैं, धर्ममें श्रेष्ठ हैं तथा चक्रवर्तीके समान चअतुरत्त हैं अथात्‌ जेसे चार दिशाओंकी विजय करनेके कारण जक्रवर्तों चतुरन्‍त कहलाता है वैसे अरिहंत भी चार गतियोंका अन्त करनेके कारण चतुरन्‍त कहलाते हैं, सर्वपदार्थंके स्वरूप को प्रकाशित करने वाले ऐसे श्रेष्ठ शान-दुर्शनकों अर्थात्‌ केवल- शान-केवलदर्शनकी धारण करने वाले हैं, चार घाति-कर्मरूप. आवचरणसे मुक्त हैं, रूवयं राग ह्वंषको जीतने वाके और दूसरोंको:




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