रसोंसर | Rasosar Aur Prirhviraj Raso Ka Sarans

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Rasosar Aur Prirhviraj Raso Ka Sarans by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नर चअसासार | कथन की हुई युक्ति जो मेने देखी ओर सुनी उसी के (उन्छिष्ट) प्रसाद से में इस ग्रन्थ की रचना करता हू। कवि चन्द की उपरोक्त उक्ति को सुनकर कविचन्द की स्त्री बोली कि हे पति इस काव्य के शब्द साक्षात ब्रह्म स्वरूप है | इनको उन्क्तिष्ट ऐसे अनुचित शब्द से सम्बोधन न कीजिए | इस पर कवि चन्द ने उत्तर दिया कि हे प्रिये, तेरा कथन सर्वथा सत्य है |यह वागी वास्तव में उस ब्रह्म के समान हे जिसके कि रूप रेख गुण आकारादि कुछ भी नहीं है, किन्तु -मेरे इस प्रकार कथन का तापपर्ण्य यह है कि में किसी प्रकार चूक भी जाऊ तो मेंरी हँसी कदापि न होगी। यह सुन कवि चन्द की स्री पुनः बोली कि हे पति आपको पाहिले तो सरस्वती जी का वरदान है इस हेतु आप काव्यकला मे मलीभांति निपुण हो, दूसरे राजा पृथ्वीराज ससार में इस समय एक अवबतारी नरेश है, तीसेरे उनके सामत भी अद्वितीय वीर है, फिर इस में उच्छिष्ट डीक्त केसी / यह सुन पुन कवि चन्द बोला कि है चन्द्रमुखी यह भी सत्य है, यद्यपि में काव्यरचना मे प्रवीण हू ओर यह काव्य रसमय होगा किन्तु उक्ति वही है जो कि मेरे से प्रथम कवि अपने अनेकानेक ग्रन्थो में वर्णन कर चुके है, इसलिये मेरा उन्छिष्ट कहना अयेग्य नही है । इस प्रकार कवि चन्द स्री की शका का समाधान करके ईश्वर के ऐश्वर्य्य का वर्गन करने लगा | वह कहता ह कि हे प्रिय, मे सव से पहिले अपने उप्त आदि टेव को प्रणाम करता हू जिससे अक्षय आकार शब्द उत्पन्न हुआ है, पुन वह ईश्वर केसा है कि उसने निराकार से साकार किया अर्थात्‌ उससे प्रथम कुछ भी न था उसने ही अपने इच्छानुसार इस जगत को निर्माण किया, उसके तेज से है सत, रज, तम ये तीनो गुण आर इनसे ही स्त्रग, मृत्यु, ओर पाताल लाकादि उत्पन्न हुए, पुन उसने ब्रह्मा का रूप वारण कार वेद का उन्चारण किया जिसमे कि इसी आदि काता का गुणानुवाद वर्गीन है कि बह सर्व गुगा है अथीत्‌ वह किसी प्रकार के गुण अर्थात्‌ माया के प्रपच में बद्ध नही है, किन्तु तीनो लोक ब्रह्मो, यम, इन्द्र, वरूण, लोकपानन, पवन, अग्नि, जल, आकाश, नदी, नाले, बन, पर्वत, समुद्र इत्यादि आर ८४ लक्ष योनि ये सब उसी ने बनाए है'कि जिनका वर्गन करना कठिन है-उस्ती न १८ प्रकार की वेली अलग अलग गुण की वनाई-काई उम्तकी आज्ञा को भग करने में समर्थ नहीं है, सब उसकी आज्ञा को शिराधार्ग्य करके सुख दुख महन करने हैं, रात दिन साय प्रात नियमानुसार उसकी आज्ञा से होते है, दिगषाल उसी के आज्ञानुसार भूमि को थाम्हे हुए है, पवन उसी के आज्नानु्तार प्रमागा से परिमाण मात्र भी अधिक सचालन नहीं हो सकती, इन्द्र उसी के आन्नानुसार स्त्रग में बास करता हुआ मेत्रो की ठीक समय पर वर्पा करेन की प्रेरणा करता है, उसी के आज्ञानुसार अथाह समुद्र आकाश तक अपनी लहरो को उठाता है, किन्तु मर्ब्यादा का कढापि छोड नहीं सकता | तात्पर्य यह है कि उसके नियत किए हुए नियमा को उल्लंघन करने की किसी में भी सामर्थ्य नही है, उसी के नियमे। पर, जिसे 'प्रकृति' कहते है, यह ससार निर्भर है ओर रहेगा, कोई भी परिमाण को मेट नही सकता, जीव वही कर्म करता है जो कुछ उस आदि देव परमात्मा की आज्ञा होती है। ब्रह्मा ने वेद वर्णन किया जिसमे जले थल क्री कोई वस्तु वर्गेन करने को शेप न रही-पुन वेद- व्यास जी ने १८ पुराण बखान किए जिनमे नाना अवातरो की कथाए वर्णित है-फिर वाल्मीकिजी ने सहला ग्रन्थों का मत लेकर रामावतार की कथा वर्णन की-फिर अनक कवियों ने लोको का अ्न्नान दूर करने के लिये नाना काव्यो की रचना की-किन्तु है प्रिये, यह सब हुआ पर उस अनन्त जगर्दाश्वर के गुणानुवाद का वर्गन कोई भी न कर सका शरीर न उमके विषय मे कोई भी निश्चय जानकारी प्राप्त सम्पन्न इस जगत का क॒ती इंस्वर स्वयं गुणगहित , ऋर सक्का, किर भला मेरी ब्रातही क्या 6, यदि इस




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