जीवन का कर्तव्य | Jivan Ka Kartavy

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Jivan Ka Kartavy by स्वामी रामसुखदास - Swami Ramsukhdas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बेराग्य ३३ तेनोपकृतमादाय शिरला. आउयसंगताः । त्यक्त्वा छुराशाः शरण ब्रज्ञाम्रि तम्रधीध्चरम ॥ तुझा... श्रदघत्येतद... यथालाभेन जीवती । विदराम्यमुनवाहमात्मना.. स्मणेंन.. बें॥ (श्रीमद्धा० १६ | ८1 ३८-४० ) ( अवश्य मुझपर आज भगवान प्रसन्न हुए हैं ) अन्यथा मुझ अमागिनीकों ऐसे कूद ह्वी नहीं उठाने पड़ते, जिससे “बेराग्यः होता है । मलुप्य बगग्यक्े द्वारा ही सत्र बन्‍्वर्नोकी काटकर न्त-छाम करता है | अब में भगवानतका यह उपकार आदरपूवक प्र झुकाकर खीकार करती हें और विपयमोगोंकी दुगशा छोइकर उन परमंद्धाकी शरण ग्रहण करती हूँ । अब मुझे ग्रार्चानुसतार जी कुछ मिल जायगा, उसीमे निर्वाह कर छगी और घंतोष तथा श्रद्धांक साथ रहेंगी। में अब विल्ी दूसरेकी ओर ने ताककर अपने छदश्श्वर आत्मखरूण प्रभुके साथ ही विहार कब्य्गी सब यदि एदाथोर्म होता ता राजा-महाराजा राज्यका और पदार्थोत्या त्याग क्यों करते। राजा भवृदरिने कहा दै--- काकी निःस्पहः शास्तः एणियातों दिमस्व्ररः दा शास्सी भ्रविष्यामि कर्मनिसूंसन क्षमः ॥ दर पे हें श का अलडर ने रु अकेला, म्पृद्ागहित, झास्तचित्त, ढरपात्री और दिसम्बर तु हि +्न बढ ना ब्न्न्‍ | कर डे झम्मो मे कब अपने कर्मोक्को निमूछ करनेमें समय गा कि न्‍ श् हे पद मर्वहरिं सत्र कर्मोका निमूण्न यानी अत्यन्ताभाव--ऐस्ी अत्स्ा केवल चाहत ही थे, ऐसी वात नहीं, ने उसे ग्राप्त करके ही रहे । उनकी व्याकरणके नियमेकी कारिकाएँ (इक) देखनेमें जाती ः कर, ज्ञा० क्र० 3०:




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