कान्यकुब्जप्रकाशिका | Kanyakubjaprakashika

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutShri Murari Dev
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
58
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about श्री मुरारि देव - Shri Murari Dev
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)[४४७०-६७. २१ )के खिचघान से यज्ञ को करसके लड़ ऋषशी चर जोडी
शुक्ल यजसे यजक्षलित्रि करें जह प्रकलाउवय और ऊ पे
से करे खुद कृष्लाध्यये कहाता है ये यज के दो सेंद् दोने से
दो अक्ार के अच्चयें हैं ॥ २७ ४याज्ञिकाइयसथी याज्ञ-स्स्नातक/क्रत्कोमखी ।खयाजोी पोौलिकश्च स्मात्तेपाण्डे यमिश्वका: ॥२८॥
साध्यन्दिनी यःऋातोयः कठकःशाःकलीयक:
सोद्गलीयःकौथ॒मोयो मोमिलीयसोहिरण्यकः ॥२«॥।
इत्योदिवहवोसेदा-श्शाखासतच्रसमाण्वयात् ।
जात्ताजिज्ञासुभिरिति चरणव्यूहईद्यताम् शहइण। |शाखा और कहरप सुत्रों के मिल लिचानों से यजक्ष करने
खाले अर कहरकों के यार फिल, ऊअपवखसची, याक्ष, स्वातक, क्रत॒क, सरदीससवयाजी, श्रीतिक, स्साक्त , मिश्रक, साच्यन्दिनोय, कासोय,
'कठक, शाकलीयक, सौद्धलीय, कौथमीय, गोौलिलीय, छिरणपकजा दिरिययक्रेशीय, इत्यादि जहुत उपाधि हुई हें जिनका दया-
रूपोश जिक्ासु लोगों को चरणा व्यद -ग्रल्थ .में देखना चाहिये
॥ रुप: थे रेल ॥ ३० #॥ ४!
-अनन्न्योपाख्यातयस्तेषों विद्यावहंगणापश्रयात ।
'समुदुभूत्ताद्वि जोग्यू चु विख्य'्तास्सल्तिभुत्तले ४३९
विद्या आर अनेक गुझों के कारण अाहनरकों को-अलन्यभी -
अनेक उपारूयासियां डुइ हैं जो भमयडल व्ले मिल २.- प्रान्तों
में प्रचलित हैं सब उ॒ुप्राथियों को सब नहों जानते ॥ ३९ ॥ :
तदभेदाश्वप्रकथ्यन्ते संध्वेपादेवक्केचन ।. ,
विद्यारत्नस्तत्वनिधि-बैंद्ान्तीताकिकरुतेथां ॥३२॥
सर्कंपज्चाननस्तर्को तकोलल्भारए व च-1
User Reviews
No Reviews | Add Yours...