अथर्ववेदीय दन्त्योष्ठविधि | Atharvavediy Dantyoshthavidhi

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Atharvavediy Dantyoshthavidhi  by रामगोपाल शास्त्री - Ramagopal Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रधमोष्ष्याथ: | रड पर (प्रिध्रषप/ ६प्शशभु७छ पाठ उचित प्रतीत छुआ दे झोर उसे ही >> के के -०न- हम ने भूल में देदिया ह । (२१) झ० व, प, छितीय स्पशेय:। यहां पर छितीय स्परुय। पाठ शुद्ध प्रतीत हुआ है, अतः सूल मे १1१० की तरह इसे भी शुद्ध घरके रख दिया है । (२२) झ० विव”, घ० विवत्राय , प० विवधाधे। घ० का पाठ कुछ शुद्ध लिखा हुआ ह, परन्तु वहद्दां भी एफारान्त फे स्थान में पक्कारान्त पाठ अशुद्ध है छुद्ध पाठ 'पब्रबबाध!! ८४६1 दूं । झा प० का ता पाठ सघथा अशुद्व छ । शपुस इलोक में विशेष बक्तन्य यह है, कि यहां पर प्रत्येक उदाहर ण में वकार छितीय वर स्थान मे ए और चफार प्रथम । इसी - आशय ल्‍्त इन उदादरणों के लिये मूल मे द्वितीयस्पढठय। पाठ प्राय; €। वाह वाहदा बहल ढदष्न्या बद्धकसंव व्‌ | अत सब कचन्त्याष्थ्या य नाक्त सतत तु द्तजा।॥1१२॥ बाह्य २७१, बाहव। २। १€। ७॥ बहुल ४।९५। ६, धन्या ४1९१, ओर वद्धकम ६॥१२१॥४, ये सब (पद) आप्छ्य ओर जो (यहां) नहें। पढ़े गये वे दन्तज अर्थात दन्त्य हैं ॥॥२२॥ (२८ ) व, प, वाह । वेद में यद्व पद कईद्दी नहीं अतः हम ने इस के स्थान पर “वाहो” पद स्वय मूल में दिया दे ॥ ञ् (-४) गअर० वब० “बहूलम” यहां पर हरवें इलोक फे आगे फिर श्म इले फ से पाठ झारंभ होता है, अठः प्रतीत होता है, फि यहां से दन्त्योप्ठचिधि का : द्वितीय अध्याय आरम्म होता है यहां अध्याय का क्रम हमारा हे। 71 प्रथमा$ध्याय। । /212 ८




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