संस्कृतबीजकग्रन्थ भाग - 1 | Sanskritabijakagranath Bhag - 1

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Sanskritabijakagranath Bhag - 1  by पण्डित मोतीदाम जी - Pandit Motidam Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२१ खंडन करने वाले इस बीजक प्रन्थके अनेक वचनों से ७ परमतत्व ” का इस प्रकार वर्णन क्विया है कि-- « एक कट्टों तो है नहीं, दोय कहों तो गार। हे जेसा तैसा रहे, कहें कबीर विचार '॥ ( बीजक )* उक्त परमतत्व के अत्यन्त निगृढ़ होने के कारण उसके द्वेत या अद्वित के निणय करने में वेदों का सिर्मौर ऋग्वेद भी इस प्रकार अपना सन्देह प्रकट करता है। फिर दूसरों की तो बात ही क्‍या है । इस मन्त्र पर सायणा- चारय”कै भाष्य में लिखा हे कि- * वह परम तत्व अद्वेत रूप है कि द्वेत रूप है इस बात को मैं नहीं जानता हूँ, अतएव सन्देह में डबे हुए मन से वर्तमान हूं । यदि मुझ को प्रथमज ( सदगुरु ) प्राप्त होंगे तो में इस परम सत्य के रहस्य को हृदयंगम कर सकूंगा '। इस प्रकार वह परम तत्व भद्वेत रूप है कि द्वेतरूप है, इस का संक्षेप से प्रमाणपूर्वकक उल्लेख हो गया । अधिक विस्तार से क्या लाभ । रत्नरूप इसब्बीजक ग्रन्थ की हिन्दी भाषा विरचित अनेक टीकाएँ हैं । गरीब साहब के पन्थवाले गरीबदासी महात्मा श्री बोधानन्दजी की बनायी हुईं गद्यहप एक संस्कृत व्याख्या भी है जोक़ि श्रुति और सम्ृतिओं के प्रमाणों से पुष्ठ है। उस 6रुक्ृत टीका के छपे हुए दो तीन ही प्र मेरे पास हैँ। में खयाल करता हूं कि दुष्काल ने उसका छपना रोक दिया इस लिये उतनी सी छपी और नष्ट हो गयी; परन्तु इस बीजक ग्रन्थ की संस्कृत पद्यरूप व्याख्या मेरी दृष्टि में आजतक नहीं आयी | इसलिये इसकी रचना से श्री स्वामी हनुमानदासजी साहेब ने संस्कृत के विद्वानों का ध्महान्‌ उपकार किया है। इसकी व्याख्या भी श्रति स्व्ृति पुरण और इतिहसों के प्रमाणों से युक्त है और सीधी तरह अर्थ के समझाने में समर्थ है । मैँमानता हूं कि, बीजकाथरूप समुद्र को पार करनेवालों के लिये यह व्याख्या मे तुरूप है। जिसप्रकार रामदल को पार कराने'के लिये श्री हनुमानजी आदिकों में समुद्र पर




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