देहरी के दीप | Dehri ke Deep

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Dehri ke Deep by प्रदीप - Pradeep

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मैं जंगती के अंधकार को, शायद प्रभापूर्ण कर पाता 1 किन्तु तुम्हा री प्रनका वलिसे, यह तमसा घनघोर हो गई। ग्रगर जगत की सारी पीहा, मुझ सी ही प्नवोली होती । मंदाती सरिता पर्वत के, निर्भर की हमजोली होती । भच्छा होता भगर जलघि में, मुझको कहीं कगार न मिलता, कौन विवशता के हाथों यों, बिकता झौर ठठौली होती। - ः में जग की भ्राकुल प्यासों को, शायद प्रमृत घट दे पाता। लेकिन भपनी प्यास बुझाने की, यह घटना भर हो गई। बे के के




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