देहरी के दीप | Dehri ke Deep

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
784 KB
कुल पष्ठ :
92
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)मैं जंगती के अंधकार को,
शायद प्रभापूर्ण कर पाता 1
किन्तु तुम्हा री प्रनका वलिसे,
यह तमसा घनघोर हो गई।
ग्रगर जगत की सारी पीहा,
मुझ सी ही प्नवोली होती ।
मंदाती सरिता पर्वत के,
निर्भर की हमजोली होती ।
भच्छा होता भगर जलघि में,
मुझको कहीं कगार न मिलता,
कौन विवशता के हाथों यों,
बिकता झौर ठठौली होती। - ः
में जग की भ्राकुल प्यासों को,
शायद प्रमृत घट दे पाता।
लेकिन भपनी प्यास बुझाने की,
यह घटना भर हो गई।
बे के के
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