वेदार्थ मञ्जरी | Vedartha Manjari

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
21 MB
कुल पष्ठ :
302
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)वेद आर भारतीय परम्पण 2]
आत्मपरिकत्पना पर आधारित होती है। मनुष्य का औत्मानुभव और विश्वानुभव एक साथ जुड़े रहते हैं और
वे किस प्रकार सम्बद्ध हैं, यह अनुसन्धान तभी सांस्कृतिक विचारधाराओं को उनका आधारभूत रूप प्रदान करता
है। सभी अनुभवों के विषयी के रूप में मानवीय स्वरूप के अनुसन्धान को आत्मविद्या कहा जा सकता है।
विश्व-प्रकृति के उद्गम के विवेचन के रूप में सभी प्राकृतिक और विषय-तात्तिक मीमांताएँ सृष्टि विद्या में
परिसणनन होती हैं। इस प्रकार आत्मविद्या और सृष्टिविद्या, इन दो तरह के ताने-बानों से वैदिक विचार-वितान
का निर्माण हुआ है। प्रारम्भिक वैदिक युग में सृष्टिविद्या के मूत्र प्रधान थे, और पुरुषविद्या के अपेक्षाकृत गौण।
परवर्ती वैदिक युग में आत्मविदया का प्राधान्य देखा जा सकता है। पूर्व वैदिक युग में ऋत ही सृष्टि का मूल
नियामक तत्त्व था, देवता ऋत-सूत्र से जुड़ी ऋत-यित शक्तियाँ थीं। ऋतू, सत्य और देवता एक ही तत्त्व के
तीन आयाम थे। पुरुष एक ओर विश्वातिक्रामी देवतातत्त्व ते अभिन्न था, दूसरी ओर अपने विश्वाभिव्यक्त
रूप में वह देवताओं की सृष्टि, हवि और याजक माना जाता था। स्पष्ट ही मानव पुरुष दिव्य पुरुष से यज्ञ
के द्वारा जुड़ा हुआ था। परवर्ती वैदिक युग में देवताओं का स्थान ब्रह्म ने, ऋतू का धर्म ने ले तिया और 'पुरुष'
से अधिक प्रचलन 'आत्म' शब्द का हो गया। यज्ञ का स्थान उपासना और अन्ततः ज्ञान ने ले लिया। और
अन्तिम ज्ञान था आत्म और ब्रह्म का अद्दैत। पूर्व वैदिक युग के मुख्य विचार-पद हैं ऋत् और देवता, पुरुष
और यज्ञ। अपर वैदिक युग के प्रत्यय हैं-ब्रह्म, आत्मा, उपासना, ज्ञान और धर्म। आज तक ये प्रत्यय भारतीय
चिन्तन को प्रकाशित करते आये हैं।
संदर्भ :
1. महाभाष्य
2. प्रसिद्ध कवि और मनीषी होन्द्रे का कथन था कि यह संख्या विदित तारों की संख्या है, जो कि तॉलमी के आन्मजेस्ट
से मेत खाती है।
$, वेदांग 6 प्रसिद्ध हैं-शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, हन्द, ज्योतिष (आपस्तम्ब 2.4.8.11) | पुराण, न्याय, पीमांसा
और धर्मशास्त्र उपांग कहे गये हैं। ऋगेद का उपवेद आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, साम का गान्धर्व, अथर्व का
स्थापत प्रमाता अर्थशास्त्र कहे गये हैं।
4. गोविन्दचन्द्र पाण्डे (सं.), इतिहास और उपन्यात्त इलाहाबाद संग्रहातय, 1994,
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