शिवराज विजय | Shivraj Vijay

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Shivraj Vijay by भगवन दास (Bhagwan Das)

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about भगवन दास (Bhagwan Das)

Add Infomation About(Bhagwan Das)

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
का 900099०७9०-७9७०७० न्न्न्न्य ि 8 विपरीत इसके, शिवराजविजय में, भाषा उत्तमोत्तम, ओज- ॥ ; स्विनी भी, अर्थपूर्ण भो, सुवोध्य भो, ययास्थान, यथावसर, उद्दाम 0 ६ भी, कोमल भी । नवोरत भी इसमें वहुत औचिती भौर दक्षता से ; ; खज्े है, दीरस्त, जिसका अर्वाचीन सस्कृत-साहित्य में प्राय अभाव ही है, वह इस ग्रन्थ मे प्रधान है, शड्भार भी है, और सर्वथा | सात्विक, सुदछील, कोमल, प्रीति रूप, कही भी अश्छीलता आते नही पाई है, युद्धो के प्रसंग में रौद, भयानक, वीभत्स का, और वीर के सम्बन्ध में अद्भुत का, रुप बहुत पर्याप्त मात्रा में दिखा ः दिया हैं। राजनीति और चार-चातु्य और रणकौणंक का भी । : निह्पण बहुत सुन्दर है। सर्वो्परि गृण इसका यहू है कि विषय $ ऐतिहासिक, अधिकाश वास्तविक हैं, कपोल-कल्पित-नही, ' 1 देशभक्ति, जम्म-भूमि-भक्ति, प्रजा की राज-भक्ति, राजा को प्रजा- ९ भवित, दोनो की धर्म-भक्ति, और भारतीब-रा्रीय-भाव से भरा है, : पिल भावों का अर्वाचीद सस्कृत ग्रन्यों में सर्दथा अभाव हैँ । / 2 में जान नही सकता कि क्यो पण्ित मण्डली में अब्लीलता- े पूरे, 'हजदू-आजष्टपद-पूर्ण' माघ किरात आदि काव्यो की इतनी ! महिमा है, और इस रलमूत ग्रन्थ से ईष्या नही हो विमुखतता है ! ३ “पका जितना अधिक प्रचार हो उतना बच्छा है-- भगवानदास:-




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now