भैषज्यरत्नावली | Bhaishjya Ratnavali

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बडी १४1९५ ०065 18. २८ 1७७, हा (7५तटद्र269, 50%, अत/1० न्ह्ने 80/0/8५ ७ 400०2३/निवेदन मरि0४८: 48161.८ जौवन कौ सुपर और शान्तिपूर्वक ध्यतीत फरने में सफल होना ही मानवज्ोवन का लक्च्ये है | इसी के लिये सभो बुद्धिमान्‌ व्यक्ति प्रय्शील हैं 1 इसकी सफलताएके जितने भी साधन हैं ये सब स्वस्थ शरीर से दी संभव हैं। कहा भा है--'धर्मार्थफाममोक्षाणामारेग्यं मूलसाधनम । शरीर को स्वस्थ रखने के दो मार्म हैं । पहिला--रोगप्रतियन्‍्धक उपाय अर्थात्त्‌ स्वास्थ्य- रक्षक नियमों फा पालन करना। दूसरा--रोगनाशक उपाय अर्थात्‌ चिक्षित्सा। पहिले मार्ग, को समुचित रुप से ग्रहण फरने से मजुष्य कभी बीमार नहीं द्ोता है अतः यही श्रेयस्करभी है| “170४ण०ापणा ३5 #लाहा धागा व्धा&” किन्तु मनुष्य असावधानी और प्रमाद फे फारण स्वास्थ्यरत्तक नियमों के घिपररीत आचरण करता ही है, इससे चह अस्वस्थ दो जाता है, अतएव घिफित्सा की आवश्यकता अनिवाय॑ रूप से होती है । संसार में जितनी भी चिकित्सा-प्रणालियाँ हैं, उन सबको उत्पत्ति आयुर्वेद से ही हुई है, ाधुवेद फे मूल सिद्धान्त दी विकसित रूप से सभी चिक्रित्सा-प्रणालियों में पाए जाते हैं । यद्याप चिक्रित्सा विशान अमुभव और प्रयोगजन्य शास्त्र है अत. इसमें समयाज्ञस परिवतंन और परिवद्ध न होना स्पामाबिक ही है| किस्तु त्रिकालदशों ऋषियों ने, जो चिकित विज्ञान के आचाय॑ थे, श्ायुवेद का आधार ऐसे दृढ़ और स्थिर सिद्धान्तों को बनाया है ३ अब तक अवाधित रुप से चल रहे हें । यह चिकित्स-शासत्र आयुर्वेद भारतवर्ष में पूर्णक से सफल हुआ है, इसमें किसी को मतभेद नहीं द्दे। रे धर चिफित्सा फे दो अंग हैं, निदान और उपचार 1 उपचार में अल्ञभवों का महत्त्व ही झधिष है। चिकित्सा में प्रयोग दो प्रकार के हैंएक काष्टीषधों से निर्मित, दूसरे खनिज औपध से निर्मित जो रस कहलाते हे । काछ्ोप्धों से निर्मित प्रयोगा का प्रचार अधिक प्राचीन है, किन्तु उपयोगिता में रसौपधो का सूह्य अधिक डे कसम के मे आयुर्वेद में अनेझ चिकित्सा अन्थ मिंषा-मिंले | बिदानां के श्र्णत 5 जिनमें उनके अजुभूत 2 हि न है | काछौपध आर रखसोपध दोनों प्रकार के श्रयोगों के पृथकू- आप प्रयोग का अल प्रन्‍्थ ऐसे भी हैं जिनमें भिन्न भिन्न विद्वानों के परीक्षित प्रयोगों श्यक्‌ सा ली सन प्रकार के हँ। ६ केबल काष्टोपध श्रयोगो का संग्रह, २रुस वो का चंद. दो मार के मोगा सं के ३. संग्रहगरन्थों में प्रस्तुत ग्रन्थ मैपप्यरला भ्रमुख तब्रन्थ है । इसके इस प्रकार के संम्रदमन्थ न ग सन्नहर्वों शताब्दी के अन्तिम भाग में बंगाल में प्रशेता महामद्ोपाध्याय ध्रीगोविन्द्दासजा योगों का संग्रह इस श्रन्थ में किय हैं। उनमे अपने सफलवादायक अडदूत से पर घिई क हे डर क संग्रह के वाद भी विद्वान, चैंधां ने अपने अछुभूत ओर विशेष अचलित के मौलिक, संग्रह के वादपैगों को. और पढ़ा दिया हे, इस श्रकार नए संस्करणों में अयोगों को वृद्धि होतों दी भ्योगा को ऐ




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