अभिज्ञानशाकुन्तलम् | Abhigyanshakuntalam

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Abhigyanshakuntalam by कालिदास - Kalidas

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about कालिदास - Kalidas

Add Infomation AboutKalidas

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
शाकुन्तल-समी का २७ कण्व मानव स्वभाव को अच्छी तरह समझते हैं । वे जानते हैं कि दु ख का सवसे उत्तम औषध समय है । कुछ समय वीतने पर दु ख अपने आप कम हो जाता है । पतिगृद्ू जाते समय शकुन्तका के यह कहने पर कि देशान्तर जाकर में केसे जीऊँगी, वे उसे समझते है) वे कहते ई--घवराओं मत । कुलीन और वैमवसम्पन्न पति के घर जाकर जब तुम वहों के कार्यों में व्यग्म हो जाओगी ओर जव तुम्द पुत्र हो जायेगा तो तुम धीरें- धीरे मेरे विरह् को भूल जाओगी। कुडम्व के किसी व्यक्ति के परदेश चले जाने पर घर के छोगों को अपना घर सूना लगने छूगता है। इसंका 'कारण प्रेम होता है। कुछ दिनों के वाद विरह भूल जाता है और मन स्वस्थ हो जाता है। यह भी मनुष्य स्वभाव का एक रहस्य है। इसे भी कण्व अच्छो तरइ जानते हैं। शकुन्तला के जाने पर प्रियवदा और अनसूया कददती हैं--इम छोग शकुन्तछा के बिना सूने तपोवन में प्रवेश कर रहें हैं । इस पर कण्व कहते हँ-प्रेम के कारण ऐसा अनुभव हो रद्दया है। कण्व कन्या को परकीय द्वव्य मानते हें । वे उसे शक प्रकार की परोहर समझते हैं ।'उसे पत्ति के घर भेज कर वे अन्तरात्मा में विशदता का अनुभव करते # । विदूषक--श्सका दूसरा नाम 'मसाधब्य” है। यह हास्यरस का पात्र है। यद्द जाति का बाह्मण है ( पृष्ठ ९१२ )। समवत यह उम्र में राजा से छोटा है।, क्‍योंकि यह अपने को 'राजानुज! और 'थुवराज! कदता है ( ७० ५३४ ) | राजा भी इसे ब्राह्मण-बढ़ कहता हूँ यह द्वाथ में स्वेदा एक डडा रखता हैं। इसका डडा टेढा है ( पृ० १४१ )1 यह पेट्ट है । बीच वीच में इसे खाने की याद आ जाती है ( छ० ९४७, ४४३ ) । यह स्वभाव से वरपोक है । यह राक्षसों के डर से शकुन्तला को देखने जाने से इन्कार करता है ((घ्ृ० १२८ ) | यह राजा के रध के चक्र का रक्षक होना स्वीकार करता है यदि कोई आकर विप्न न करें तो ( प्ृ० १२९५ )। यह राज। का मित्र है। यह उसका सुँदछया है । यह उससे खूब हँसी करता है। कभी कमी राजा की कमजोरी का छाभ उठाकर यह्‌ उस्ते बेवकूफ भी वनांता है। पष्ठ अइ में घकुन्तला का चित्र देखते समय यद्द भोरे की बात इस तरह उठाता हैं कि शकुन्तला के विचार में मम्न राजां उत्ते सच्चा भोंरा समझ कर चहुत्त कुछ कह जाता है) तव यह उसे याद दिलाता है कि यह तो चित्र का भोरा है ( एृ० ४७५६-४६१ »)। राजा यह जानता है कि यह चपल हैं। चपलता के कारण यह श॒प्त प्रणय की वातों को रानियों से कह दे सकता है ( पृ० १३४ )1 तथापि वह इससे अपना सब रहस्य कह देता है। प्रेम के समी कार्यो में यह राजा का अन्तरग सहायक है । द्वितीय ओर पष्ठ अड्डू में राजा शकुन्तला सम्बन्धी अपने भाव इससे कद्द देता है | पत्चम अबू में इसवती को समझाने के लिये राजा इसे ही भेजता है । राजा के साथ विदूषक की मंत्री का अन्य छोग भी छाम्र उठते हैं! उनका श्समें विधास है । वे जानते हैं कि यह राजा के सामने उनका भेद नहीं खोलेगा | द्वितीय अदू




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now