महाभारत | Mahabharat Aaranyak Parv (part-i)

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Mahabharat Aaranyak Parv (part-i) by श्रीपाद दामोदर सातवळेकर - Shripad Damodar Satwalekar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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.ज १८ महाभारते | [ आरण्यकपव हद ७ : छ७छ[छऋ७फ फऊकऊ ्ऋऋऋश्ेअञअअ₹ॉच+च१-- 5 हियते बुध्यमानो5पि नरो हारिमिरिन्द्रियेः । हा विसूहसंज्ञो दुष्टावैरुद्धान्तेरिव सारधिः न ॥ हि ९ क जैसे दुष्ट और दिगडे हुए घोडोंके द्वारा सारथी राहमें गिरा दिया जाता ई, वेंस | दरने- वाली इन्द्रियोंके ह1रा खिंचकर परमार्थज्ञानसे विहीन होकर ज्ञानी मलुष्य भी नष्ट | जाता है ॥ ६२ ॥ षडिन्द्रियाणि विषय समागच्छन्ति ये यदा । तदा प्रादुर्भवत्येषां पू्वेसंकल्पर्ज मनः 1 है इन्द्रियां जब अपने विषयकी ओर जाती हैं, उस समय मनुष्यका अन्त।करण पूर्व सेकल्पके अनुसार उसी विषयभोगकी कामना करता है ॥ ६३ ॥ मनों यस्येन्द्रियग्रामविषय प्राति चोदितम । तस्थोत्सुक्ध संभवति प्रवृत्तिश्रोपजायते ॥ ६४ ॥ इस प्रकार जिस्त मनुष्यक्ी इन्द्रियें और अन्तःकरण विषय भोगकी ओर दोडते हैं, उस मनुष्यकी उस विषयक भोगनेके प्रति औत्सुक्य और प्रवृत्ति उत्पन्न दोती है ॥ ६४ ॥ ततः संकल्पवीर्यण कामेन विषयेघुमिः । विद्ध! पतति लोमाशो ज्योतिलों मात्पतडवत्‌ ॥ ९७ ॥ उस समय, जैसे पतड्भा अग्निके रूपसे मोहित होकर उसमें ग्िरता है, उसी प्रकारसे विषय भोगके सहुत्परूपी श्क्तिसे शक्तिशाली कामनांक बाणसे बिंधकर लोभकी अग्रिम ग्रिरता है ॥ ६५ | ततो विहारेराहारैमोहितश्व विशां पत्ते । महामोहसुखे मग्नो नात्मानसववुध्यते ॥६६॥ पञ्मात्‌ , हे प्रजाओंके स्वामिन्‌ ! वह मूर्ख अनुष्य आहार विद्वारसे मोहित होकर मह(मोहके पुर पड़कर आत्मतचकों नहीं जान पाता ॥ ६६ ॥ एवं पतति संखारे ताखु तास्विह योनिषु । « अविद्याकमतृष्णाभिभ्रोम्पमाणोष्थ चक्रवत्‌ ॥ ९७ ॥ 4 तब कम, अविधा और विषयतृष्णासे चक्रके समान अमित होकर इस संसारमें उन उन योनियोंमें जाकर गिरता है ॥| ६७॥ त्रह्मादियु तृणान्तेषु भूतेषु परिवतेते । _ . जले झुबि तथाकाशे जायमानः पुनः घुनः ॥ ६८ ॥ नज्ाल लेकर तिनकेतक भूमि फिरनेवाले, आकाशमें चरनेवाले, और जलचर आदि योनि- यॉर्म वारंबार जन्म लेता हुआ भूमता रहता है ॥ ६८ ॥ ०




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