षट्खंडागम खंड 9 | Shatkhandagamh Khand 9

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Shatkhandagamh  by हीरालाल जैन - Heeralal Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सिरि-भगवंत-पुष्फर्दंत-भूदवलि-पणीदो $ छ.ु छदखदागसा सिरि-वीरसेणाइरिय-विरइथ-धचला-टीका-समाण्णिदो तस्ख चउत्थे खेंडे चेयणाए कदिअणियोगद्वारं सिद्धा दद्धइमला विसुद्धबुद्धी य लड़सचत्था । तिहुवणपिरसेहरया पसियंतु भडारया सब्बे | १ ॥ तिह॒वणभवणणसरियिपच्चक्खवबोहकिरणपरिविे । उद्यो वि अणत्थवणो अरहंत-दिवायरों जयऊ॥ २ ॥ आठ कमरूपी मलको जला देनेचाले, विशुद् चुद्धिसे संयुक्त, समस्त पदार्थोको जाननेवाले, तथा तीन छोकके शिखरपर स्थित ऐसे सब सिद्ध भट्टारक प्रसन्न होगे ॥ १॥ जिसका प्रत्यक्ष शानरूपी किरणोंका मण्डल निशुवनरूप सवत्तमें फैला हुआ है, हो जो उद्ति दोता हुआ भी अस्त होनेसे रहित है, ऐसा अरहन्तरूपी सूभे जयबन्त ॥२॥ कु, क, १६




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