ऐतिहासिक उपन्यास | Eitihasika Upanyasa

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
11 MB
कुल पष्ठ :
202
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)पहले हैं उपन्यासकार बाद में एवं चिलकमते जी उपन्यासकार पहले हैं और
न तिकतावादी बाद में ।इन दो महात् लेखकों की रचनाओं के बाद, कुछ समय तक, इस
शताब्दी के प्रारम्भ में, बंगाली, हिन्दी, मराठी आदि भारतीय भाषाओं के
तथा अंग्रेज़ी, फ्रेंच आदि यूरोपीय भाषाओं के उपन्यासों के अनुवादों की बाढ़-
सी आ गयी थी । बंकिमचन्द्र के लगभग सभी उपन्यास श्री वेंकट पावंतीश्वर
कव॒लू और कुछ अन्य अनुवादकों द्वारा तेल॒गु में रूपान्तरित किये गये थे ।
यह कहता कठिन है कि इनमें कितने उपन्यास मूल बंगला से अनूदित हुए हैं।
इमी प्रकार, कुछ दशकों के बाद, शरत् के उपन्यास्नों के अनुवाद, नियमित
रूप से, (चक्रपाणि, शिवरामकृष्ण और अन्य अनुवादकों द्वारा) प्रस्तुत किये
गये । बीसवीं सदी के दूसरे तथा तीसरे दशक में प्रसिद्ध बंगाली उपन्यासकारों
के उपन्यासों का भी अनुवाद हुआ | प्रगतिवादी लेखन के संगठित रूप से
प्रचलन के बाद आधुनिक रूसी (क्रांति के बाद की) रचनाओं--क्ले सिक्म
का-- (गोर्की, हेरेनवर्ग आदि) का अनुवाद लोकप्रिय होने रूगा ।यह नहीं कहा जा सकता कि इन दिनों कोई उल्लेखनीय मौलिक
उपन्यास रचा ही नहीं गया । दो लेखक तो हमारे ध्यान को बरबस आकर्षित
करते हैं । एक श्री विश्वताथ सत्यनारायण है जिन्होंने कई प्रभावशाली रचनाएँ
की हैं तथा दूसरे श्री अड़िवि बापिराजु है, जो अधिक रचनाएं न करने पर भी,
उतने ही महत्वपूर्ण हैं। वेयि पड़गरू' (सहुख् फन) एक महतो प्रतिभा का
ज्वलन्त प्रमाण है जो पाठकों की आत्मीयता एवं ममता की अपेक्षा विस्मय
तथा प्रशंसा का पात्र है। वहु उस समग्र एवं जटिल हिन्दू सामाजिक जीवन
का सरसरी दृष्टि से, चित्रण करने का प्रयत्न करता है जिसमें वर्ण व्यवस्था
तथा परम्परागत रूढिवादिता को प्रश्नय मिला है। यद्रपि उपन्यास में अकुटिल
कुशल अनुशीलन शक्ति द्वारा विस्तुत कल्पना शक्ति का प्रदर्शन किया गया है,
तथापि वह सामयिक समाजिक वातावरण का यथावत् चित्रण करने में सफल
नहीं हो पाया है । वह ऐसी व्यवस्था के वर्णन के प्रति उत्सुक है अथवा ऐसी
व्यवस्था के प्रति पाठकों का ध्यान आक्ृष्ट करना चाहता है, जो मृत या मृत-
प्राय है और जिसके लिए बिरले ही आँसू बहाया करते है। दूसरी ओर श्री बापि-
राजू हैं जिनकी अत्यधिक कल्पनाशीलता के कारण उनकी रचनाओं में मानव
की मनोवृत्तियों तथा सामाजिक ढाँचे का यथावत् आकलन नहीं हो पाया है।
यद्यपि श्री बापिराजु का तारायणराव' प्रभंसनीय मानव वृत्तियों का उद्घांटकपदमाकर-2 65.
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