ब्रह्मसूत्रम् | Brahmasutram

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पविपयपृ पं 6शासयबोनित्यापिकरण है।१।श३ [४० १२२-१११ ]शास्त्रयो।गित्वात्‌ु ((१॥६॥६३ गृतीय अधिझरणक प्रथमयर्णसारतृतीय अधिकरणका द्वित्तीयवर्णकसार राअथधम वर्णेकाठुसार सूत्रार्थका प्रतिपादसह्ितीय घर्णफानुसार सृप्रार्थका प्रतिपादग रु सम्रन्ययाधिकरण १।१॥७।४ [ ४० १३२-२३१३ 3)तच समन्वयात्‌ १४२घतुथ अधिकरणफा प्रथमयणकसारचतुर्ध अधिफरणका द्वित्तीययेफसारब्रद्मफे शाखप्रमाणकत्वपर आछ्षेप व चेदान्त क्रिया-विधिके अह्न हैं कब पेदान्त उपासना के अद्ज हैं है सूत्रका व्याख्यान ब्ूचेदान्त क्रियाविधिके अद्ढ नहीं हैँ बहबेदान्त उपासना विधिके अन्न नहीं है नयृत्तिकारफे मतसे पृवपत्त नउक्त पूर्वपक्षका सण्डनमोक्ष शह्ासे मिन्न नहीं हैआत्मतत्वज्ञानसे मिथ्याज्ञानका नाश होता हैश्रह्मान्मैकत्वविज्ञान सम्पदादिरूप नहीं हेमोक्ष उत्पाय, विकाये, आप्य तथा संस्काय नहीं हैक्रियासे ज्ञान विरक्षण हैआत्मा द्रष्टव्य.” इत्यादि विधितुल्य वचनोरा प्रयोजन-कथन सम्पूर्ण बेद कार्यपरक है इस मतका सण्डनआत्मा केवल उपनिषदोसे ही आना जाता हैदधि आदि शब्दोंके समान वेदान्त भी सिद्ध बस्तुका बोध कराते हैं निपेघवाक्योंके समान वेदान्त सिद्धार्थका प्रतिपादन करते हैं ब्राह्मणों न हन्तव्यः इत्यादि वाक्योंम् निषेघका अथ > जिसको 'मैं अक्ष हूँ ऐसा ज्ञान दो गया है, वह पूर्वेकी तरहसंसारी नहीं रहता१२२- १ १२२ - १० १२३- ४ १५१६-९२ १३० - २१३२० १ १३१२- ११ १३३- ४ १३४ - २ १३५०-२९ १४० - ४ १४१-४ १४५० ३ १४७- ४ १०० > + श०८ - ह १६६ - १७० “ रे १७३ - *े १८१ ०-४ १८८ - ४ १९२० ४ १९५ - ४ १९७-५ २०१० *२ र०४ - हे २०७५ ०- ४र१० ०५




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