महाभोज | Maha Bhoz

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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महामोज « 27 कि कब दा साहब की समाधि टूटे और कद आगे के लिए आदेश मिले। जो भी है, निर्मेर तो अन्त तक उन्ही पर करना है। आँख खोलकर दा साहब ने घडी देखी--नौ दज गये। “अच्छा तो तुम पांडे को बोल दो, मोदिग की तैयार करवायें। होशियार थादमी है, स्थिति संभालना जानता है।! फिर उठते हुए बोले, जैसे अचानक याद आ गया हो, “और हाँ, जाओ तो झरा “मशाल' के दपुतर होते जाना। दत्ता बाबू ही माम है न सम्पादक का ? कोई तीन-चार महीने पहले इन्टरव्यू लेने के लिए समय माँगा था ।,..पर कहाँ था उन दिनों समय ? बहना, अब समय लेकर मिल लें किसी दित मुझसे । फिर पास आये और बडे स्नेह में लखन की पीठ पर हाथ रखकर बोले, 'लखन, आज का तुम्हारा आवेश देखकर बच्छा नहीं लगा मुझे । मेरे साथ चलना है तो भाई, छबान पर लगाम और व्यवहार में ठहराव चाहिए. ,.समझे !/ दा साहब यह वात केवल कहते ही नही, अमल मे भी लाते हैं। उनके थूरे व्यक्तित्द में, उतकी हर वात और हर काम मे जबरदस्त ठहराव है। ओर इस ठहराव की वजह से ही वे शायद ढुर्सी पर भी ठहरे हुए हैं। वरना पिछले दस महीनों में विरोधियों मे और उनके अपने दल के असमन्तुष्ट लोगों ने जेसी-जैसी तिकड़मे की हैं, कमी की कलामुंदी खा गये होते !




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