कवितावली | Kavitavali

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Kavitavali by चम्पाराम मिश्र - Champaram Mishr

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ ११ इृहि बिधि कछुक काल सुख पाये साठु पिता परलेाक सिघाए । तिनके कर्म कीन्द वह भाती सन में साच करत दिन-राती ॥ तहूँ गुरु कहीं पुनि कथा पुरानी चरहरिदास मनादर बानी | सुन तुलसी अब सोच विदाई सबके सावु-पिता रघुराई ॥ सा तुम मानइ विश्रचर राजापुर को जाहु। चतहु मेरे बचन अब करहू आपना दयाहु ॥ यह सुनि तुरत चले ननियावर पहुंचे यूद्दी भरें सब चाँवर । पुनि सुन्दर कुछ देख बरावा साठुल ने त्यहि ब्याह करावा ॥ करहि रसन गुरु-ज्ञान भुलाना पत्नी सहित परम सुख साना | इन्हीं कथाओं के ऊपर युक्ति जमाकर लोगों ने अनेक ऐसी दी बातें जाड़ ली हैं। परन्तु तुलसीदास के समकाशीन किसी अन्थ में इनकी चचां झभी तक नहीं मिनी है । कदाचित्‌ प्रियादास वाली बात की पुष्टि में ही यह सब लिखा श्रार कहा गया है। प्रियादास वाली बात पर हम पहले ही कह चुके हैं कि वह कोई प्रमाण नहीं कहा जा सकता । हमारी समक में ता इन सबके स्थान में तुलसीदास का लिखना कि ब्याह न बरेपी ही को प्रामाणिक मानना चाहिए | बाज लोगों ने यह कहकर प्रियादासवाली बात के सच मान लिया है कि यदि तुलसीदास को युहर्थ अवस्था का अजुभव न हु होता ते वे उसका ऐसा झच्छा वशेन न कर सकते । यह कोई बात नहीं । तुलसीदास ने झनेक बातों का ऐसा उत्कष्ट ब्णन किया है जा उन्होंने प्राझतिक चज्ु से तो कभी न देखा होगा यथा रावण का अखाड़ा श्रथवा जनक की राजस भा श्रादि । कवि को मानसिक प्रज्ञा होती है श्रार उसी धारणा से वह अनेक चीजों का अनुभव कर लेता है। परन्तु जब तक वे बाते न बताई जायें जो तुलसीदास बिना गृहस्थावस्था का अनुभव किये नद्दीं लिख सकते थे तब तक उनके सम्बन्ध में क्या कहा जाय । हमारी समभा में तो ब्याह न बरी झथवा ब्याहे न बरात गये उन्हीं के लिए कहा जायगा जिनका ब्याह न हुआ हा । यदइ कहना कि कवि श्रनेक बातें झपने ऊपर रखकर संखार झी कहता है झथवा संसार को सम्मुख रखकर कहता है एक ऐसी बात है जा अपनी बातें के सब प्रमाण को झूठा कर सकती है । जो बाते स्पष्ट कंवि के लिए कद्दी हुई दिखाई देती हैं उन्हें कवि के लिए ही मानना चाहिए श्र जा झाम मालूम होती हैं उनका झाम समझना चाहिए | गुरु तुलसीदास के गुरु नरदरिदास्र बताये जाते हैं । इसका झ्ाधार उनका यह दाहा है--- बैदों गुरु-पद्‌-कंज कपासिन्धु नररूप हरि ।




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