विद्यापति की पदावली | Vidhyapati Ki Padawali

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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परिचय < ७. 'द.>चटि मे घोरसिद् सिहासन पर विराजमान बतलाये गये है । ३२२१ लक्ष्सणाब्द १४२८ इ० में पड़ता है क । सोचने की बात है कि जब पुत्र १४२८ ईं० में राजगद्दी पर बैठा था; तब उसका पिता १४७० सें कैसे राजा हुआ ? बस, साफ प्रकट है कि खतन्नीजी ने यहाँ भी ४६ चप॑ को गलतो का है । १४७० मे ४६ घटा देने पर १४२४ ई० सें नरसिहदेव का राजा होना सिद्ध होता है । नरसिहटेव ने; सहायजी के ही कथनालुसार; एक ही चप॑ तक राज किया था । सम्भव है, १४२७ में वे मर गये हो श्र १४२८ मे उनके पुत्र घीरसिह राजगद्दी पर विराजमान रहे हों । 'सेठुटपणी' से भी यहीं पता चलता है । इसों ४६ वर्ष के फेर से पड़कर जहाँ सहायजी ने केदल २० वर्ष की घ्यवस्था में शिवसखिंह श्र विद्यापति की भेंट कराकर तीन ही वर्षो में उनका चिरवियोग कराया; वहाँ विद्यापत्ति की झाताधिक वपे की शवस्था का भो अ्रम उन्हे हो गया था--जिसका श्रौचित्य प्रमाखित करने के लिये श्रापने जसीन-ऑाससान का कुलावा मिलाया है, निजी श्रौर सावजनिक सब प्रसाणो को पेश किया है । सद्दायजी को एक श्रौर तिथि ने भी घोखा दिया है। श्ापने पृष्ठ २३ में लिखा है कि ३४५ लक्ष्मणाव्द में इनके श्पने हाथ से भागवत-पोथी की नकल करना सिंद् होता है. । यह रालत है । सगेन्द्रनाथ गुप्त ने से थिल कचिवर “चंदा का” के साथ स्वयं 'तरोनी” जाकर उस पुस्तक को देखा था । उस पुस्तक के अंत मे लिखा है-“शुभमस्वु सर्वाथगता ल० सं० ३०९ श्रावण शुदि १५ कुजे राजाबनौली ग्रामे श्रोविद्यापतिर्लिपिरियमिति ।?? इस ३०५ को ही सहायजी ने श्रमवग ३४९ सान लिया है ! अब यथार्थ बात सुनिये । चद्द इतिहास श्रौर जनश्रुति दोनों पर श्रचलस्वित है; श्बौर ्ापकों युक्तियुक्त भी मालूम पढ़ेगो । एदियाटिक सोसाइटी मे एक प्राचीन हस्तलिखित पोधी है; जो १३२२ दाकाब्द ( २९० लक्ष्मणाब्द ) की लिखी हुई है। वह पोधी # सद्दायन्नी की गणना के तनुसार ।--लेखक




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