इंदिराज | Indiraj

Indiraj by नीलम सिन्हा - Neelam Sinha

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

नीलम सिन्हा - Neelam Sinha

नाम : नीलम सिन्हा

पिता : श्री सूरज ना० प्र० सिन्हा

सीनियर एडवोकेट पटना हाईकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट भूतपूर्व चेयरमैन बार कॉउंसिल ऑफ इण्डिया

शिक्षा : एम० ए० (द्वय), बी० एड०, एल०एल०बी०

उपलब्धियाँ : (1) पथ पे पत्थर (कहानी संग्रह) (2) धूप-छाँव (कहानी संग्रह) (3) शिवानी (कहानी संग्रह) (4) सारंग (कहानी संग्रह) (5) कहानी भी कविता भी (कविता संग्रह) (6) तुम-विन (कविता संग्रह) (7) पूनम (कविता संग्रह) • राष्ट्रस्तर की पत्र-पत्रिकाओं में रचना प्रकाशित • आकाशवाणी से कविताएँ - कहानी - वार्ता प्रसारण

पुरस्कार : भारतीय साहित्यकार संसद द्वारा 'सुदर्शन शिखर सम्मान'

रुचि : देश-विदेश भ्रमण, गाना, सिनेमा, कविता इ

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बताये कोई नई सदी में पुरानी बातें भूल क्या-कौन-सी आधुनिक अदा दिखा रहे हैं लोग पंच तत्त्व जस का तस - रक्त का रंग लाल का लाल साँस भी वही हवाएँ दे रही फिर हम क्यों बदले - बेहाल ? हमारे पुराने समाज में जो प्रेम - स्वाभाविक मिलनसरिता - सरभाव - स्नेह था जातिगत कोई नफरत-रीति-रिवाज का भेदभाव नहीं दिखता था - उसका मिलना महामुश्किल है - वर्तमान जीवन में पीछे छूट गया - हमारा स्नेहमय अतीत आज भी बड़े बुजगों । की जुवानी ............. सुनने पर यकीन नहीं आता है हम ऐसे थे । अजनबी चेहरों से भी नजर मिले, मुस्कराया करो पल भर के लिए भी किसे के दिल में उतरो, उतारा करो, एक झरने-सी बही जा रही रात-दिन ............... जिन्दगी जो पल बीत रहा, फिर नही आनेवाली कुछ तो दूसरों के लिए, वक्त निकाला करो मुस्कराने में कुछ नहीं जाता - बस भीतर के भाव को होठों तक लाना है vasanapan ... हम इससे अक्सर कंजूसी कर जाते हैं .............. करना नहीं चाहिए । हर पल ।। सपने सा नहीं, हकीकत में बीत रहा है ............ फिर न जाने ये लोग - ये खूबसूरत धरती ........... पर हम सब की मुलाकात हो, न हो, मेहमान की तरह हम सब मिले हैं मुस्कुराते नजर ................. से क्यों न मिला करें, पता नहीं यह भाव हमेशा गुम क्यों हो जाता है।




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