मनोरमा | Manorama

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Manorama by श्री गोपालराम गहमर - Shri Gopal Ram Ghammer

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मनोरमा श्छ बागीले के चारों जोर ऊंची चहारदीवारी से घिरा हुआ हैं । उस यहारदीवारी के पास पास देवदार और भकोआ कतार से लगे हैं। बाबा ने बड़ी छालसा से घर का नाम आनन्द्कुटीर रकखा था | देवे० । अच्छा तो तुम तीनों में से जो मरी है वह तुम्हारी बहन कुमों दिनी है यही सम कर न हमको काम चलाना होगा ? अच्छा तुम्हारी बहन को मरे कितने दिन हुए ? मना ० । मुझे पागढ बना कर जब कथबिराज के हाथ में कद किया तब से दो हफ्ता पदले ही वह मर गई थी । देवे० । उसका देहान्त कहां हुआ १... मना ० । आनन्दुकुटोर ही में ।. देवे० । किस रोग से ? मना० । जिस रोग से रामणुलाम मरा । देवे० | मिरगी से ? मनेा० । नहीं जहर से । जब मेरी बहन का देहान्त हुआ तब मैं खिद्रिपुर में अपनी जगह जायदाद पाने की कोशिश कर रही थी। एक हमारे वकील थे । बाबा का सब मामिला मुकदमा वही करते थे। मैंने उन्हीं को अपना सब हाल कह कर अपनी जायदाद दिलाने के लिये बिनती की । उन्होंने मेरा हाल सुनकर दुःख जाहिर किया और मुझे भरोसा दिया कि मेरे छिये वह कोई बात उठा नहीं रक्‍़्खेंगे । यहां तक उन्होंने जताया मानों मेरे वास्ते वद्द आकाश पाता सब छान डालंगे। उसके ब्रादू क ; डा




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