भारतीय दर्शन की समस्यायें | Bhartiya Darshan Ki Samasya

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Bhartiya Darshan Ki Samasya by जयदेव वेदालंकार - Jaidev Vedalankar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ज] उनके श्रालोच्य ग्रन्थ का शीष॑क है”'शारतीय ददन वी समस्‍यायें : एक समालोचनात्सक श्रध्ययन । इसग्रन्थ में कुल बारह न्रध्याय हैं,प्ौर प्रत्येक भ्रध्याय का एक सुनिश्चित दार्शनिक विषय है । यह विषया- वली ज्ञावमीमांसा से श्रारम्भ होकर मोक्ष-मीमांसा पर समाप्त होती है। बीच में तत्व-मीसांसा, श्रात्म-निरूपस सुष्टि-रचना, अते:करण ख्यातिचाद, श्राचार-मिरूपण, प्रामाण्यवाद और कमेंफलनिरूपण जेंखे विषयों की विवेचना हुई है । इन विषयों का गठन बड़ी योग्यता से किया. गया है। इन के प्रतिपादन में कहीं दुरूहता श्रथवा झस्पष्टता लक्षित नहीं होती । भाषा मंजी हुई है। समस्‍यायें प्रामाणिक ढंग से उठाई गयी हैं । प्रत्येक विषय के विवेचन में भारतीय दशेन की कोई शाखा प्रतिनिधित्व से वाब्चित नहीं की गयी है । यहू सब होते हुए भी ग्रन्थ प्रकीस विषयों श्रथवा मतों का सझग्रहू मात्र नहीं हैं, जैसा श्रन्थतर प्राय: देखने में ्राता हैं । लेखक का अपना एक सुनिश्चित, सुचिन्तित रुष्टिकीण है जो ग्रन्थ में साद्यन्त प्रशिफलित पाया जाता है । मैं समझता हूं कि यह इस ग्रस्थ को प्रमुख विशेषता है । हू कौन सा दृष्टिकोण है जो पूरो रचना को अनुप्राणित कर रहा है? इस का किब्न्वित विचार आवश्यक प्रतोत होती है । भारत में झनेक दाशषंति क सतवाद श्रत्य बढ़े, और बूढ़े हुए । आधुनिक युग में उन सब पर कारें किया. गया, सब पर साहित्य तयार किया गया, किन्तु भारतीय दासेनिकों को. गृहीत प्राय: एक ही देन हु, जिसे वेदान्त कश्ते हूँ । भ्ौर बेदान्त की भी केवल एक शाखा का सर्वाधिक प्रचार हुआ, जिसे अददेतवाद कहते हैं श्रौर जि आचार्य दाद्ुर हो गये हैं । विवेकञानन्द, रामतीथं, (» छष्णचन्द्र भट्टाचायं ने कुल मिला कर शख्ूर




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