धर्मतत्त्व | Dharmtattv

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Dharmtattv  by स्वामी विवेकानन्द - Swami Vivekanand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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का समग्र क्षत्र ध्यय और विषय व्यक्ति का उच्छेदन है नकि उसका निर्माण । उपयोगितावाद मनुष्य के नेतिक सम्बन्धों की व्याख्या नहीं कर सकता क्योंकि पहली बात तो यह है कि उपयोगिता के आधार पर हम किसी भी सैतिक नियम पर नहीं पहुँच सकते । कोई भी नीतिशास्त्र तब तक नहीं टिक सकता जब तक उसके नियमों का आधार अलोकिकता न हो या जैसा में कहना अधिक ठीक समझता हूँ--जब तक उसके नियम अतीन्द्िय ज्ञान पर आधारित न हो । असीम के.प्रति संघर्ष के बिना कोई आदशं नहीं हो सकता । ऐसा कोई भी सिद्धान्त नेतिक नियमों की च्याख्या नहीं कर सकता जो मनुष्य को सामाजिक स्तर तक ही सीमित रखना चाहता हो । उपयोगित्तावादी हमसे असीम -- अतीन्द्रिय गन्तव्य स्थल--वके प्रति संघर्ष का त्याग चाहते हैं चयो कि अतीन्दियता भव्यावहारिक है निरथंक है । पर साथ ही वे यह भी कहते हैं कि नेतिक नियमों का पालन करो समाज का कल्याण करो ।. आखिर हम क्यों किसी का कल्याण करें ? भलाई करने की बात तो गौण हैं प्रधान तो है--एक आदर्श । नीतिशास्त्र स्वयं साध्य नहीं है प्रत्युत साध्य को पाने का साधन हैं। यदि उद्देश्य नहीं है तो हम क्यों नैतिक बनें? हम व्यों दूसरों की भलाई करें ? क्‍यों हम लोगों को सतायें नहीं ? अगर आनन्द ही मानव-जीवन का चरम उद्देश्य हैं वो क्यों न मं दूसरों को कष्ट पहुँचाकर भी स्वयं सुखी रहूँ ?. ऐसा करने से मुझे रोकता कौन है ? दूसरी बात यह है कि का का आधार अत्यन्त संकीर्ण है । सारे प्रचलित सा माजिक मिय की रचना तो समाज की तात्कालिक स्थिति को दुष्टि में रखकर की गयीं




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