चीड़ों पर चाँदनी | Cheedon Par Chandani

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Book Image : चीड़ों पर चाँदनी  - Cheedon Par Chandani

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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गाड़ी बलिन की ओर भाग रही है-“मध्य-युरोप का प्रकृति-दृश्य आज तक निरपेक्ष दृष्टि से नही देख सका । देसे, रेल की खिड़की के बाहर सबकुछ शान्त ओर समतल है--सव एक ही जगह रुकी-सी भर फिर भी तेज़ी से वदलती हुई 'स्टिल-लाइफ' ! मैं मध्य-युरोप मे हूँ जर्मनी में--और यह १९६१ की गरमियाँ है--द्रर-दर फले हुए खेतो पर जून की उजली, उनीदी-सी धूप और भूरी मिट्टी की गन्ध । एक वोझिल- सी गन्ध, जिसमें पूरी एक मृत्त पीढी का अतीत 'भरा है । मैं दो वार-- लन्दन और पेरिस जाते हुए जमंनी के वीच से गुजरा हूँ--किन्तु कभी यहाँ उतरने को मन नही हुआ । कोई अदुृश्य-सा भय, एक अजीव-सी झिझक सामने खड़ी हो जाती है ! युद्ध को खत्म हुए एक लम्बा अरसा वीत यया। कोई भी आज उसे याद नहीं करता । घिसी-पिंटी कहावत है--गड़े मुरदो को उखाड़ना ठीक नहीं, यह एक बुरी आदत है । किन्तु मैं, जी एक सुद्र देश से यूरोप आया हूँ--मुझे कई वार ऐसा लगता है कि जी समय सबके लिए, यहाँ के निवासियों के लिए, वीत गया है, वहू मेरे लिए अभी तक जीवित है, प्रतीक्षारत है, और जब तक मैं उसे अन्य प्राणियों की त्तरह भोग नही लूंगा, वह मुझसे छूटेगा नही । गड़े मुरदे ? बे हर भादमी के भीतर हैं--जब कभी मध्य-युरोप से गुजरता हूँ, मुझे उनका ठण्डा स्पर्श महसूस होने लगता है । मैं पूर्वग्रह-प्रस्त नही हूँ, किन्तु आज भी मैं किसो जर्मन को देखता हूँ, तो मेरे भीतर एक फिजूल, बेमानी- सी बेचैनी होने लगती है । यह वेचेंनी एक हृद तक उस बेचैनी से मिलती है, जो मुझे बहुत पहले मान और काप्रका की कथाओ को पढने से होती थी । आज सोचता हूं, तो आश्चर्य होता है कि मैंने इस 'बेचैनी' को--सूरोप आते से पूर्व कभी ठीक से समझने का प्रयत्न नहीं किया । यह आकस्मिक नहीं है कि दोनों लेखक मध्य-युरोप के दो अलग-अलग भागों से सम्बन्धित थे--जर्मनी और चेको- स्लोवेकिया । यहाँ से गुजरते हुए पहली वार महसूस होता है कि युरोप का यहू खण्ड ज़िन्दगी के उन अज्ञात, गोपनीय रहस्यों से गुम्फित है, जिन्हे आज तक फ्रान्स, इंग्लैंड या स्पेन ने स्पर्श नही किया है । धूल का अन्घड आने से प्रुवें जैसे समूचे शहर में एक पीला, दम ब्रे्त और एक उदास नगर / १७




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