Skandgupt  by जयशंकर प्रसाद - jayshankar prasad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रथम अंक _ भातु०उनूकी बड़ो सुन्दर श्रीवा में लड्डू अत्यंत सुशोभित होता था, 'और सबसे बड़ी बात तो थी बालि के लिये--उनकी तारा का संनरित्व । सुना है सम्राट ! खी की मंत्रणा बड़ी 'अचुकूल_ और, उपयोगी होती है, इसीलिये उन्हें राज्य की भंगाटो से शीघ्र छुट्टी सिल गई । परम भट्टारक की दुद्दाई ! एक स्त्री को संत्री ाप भी वना लें; बढ़े-चड़े दाढ़ी मूंछवाल मंत्रियों के वद्ले उसकी एकॉत संत्रणा कल्याणकारिणी होगी | ी कुसार०--( हेंसते हुए ) लेकिन प्रथ्वीसेन तो मानते ही सही । धातु०-- तब मेरी सम्मति से वे ही कुछ दिनों के लिये स्त्री हो जायें ; क्यों कुसारामात्यजी ? प्रथ्वीसेन--पर पुम तो खरी नहीं हो जो से तुम्हारी सम्मति मान लू ? ्‌ कुमार--( दँसता हुआ ) हों; तो आय्य समुद्रगुप्ठ को विवश होकर उन विद्रोही विदेशियों का दमन करना पड़ा, क्योंकि मौय्यं साम्राज्य के समय से दही सिघु के उस पार का देश भी भारत- साम्राज्य के अन्तर्गत था। जगद्विजेता सिकन्दर के सेनापति सिल्यूकस से उस प्रान्त को मौय्य सम्राट चंद्रगुप्त ने लिया था । धातु० --फिर तो लड़कर ले लेने की एक परम्परा-सी लग जाती है । उनसे उन्होंने, उन्होंने उनसे ; ऐसे हो लेते चले आये हैं। उसी प्रकार चाय्य ! . ....... छुमार०--उँंद ! तुम समभकते नहीं । मु ने इसकी व्यवस्था दी है। कि , घातु०--नहीं घम्सावतार ! समक में तो इतनी बात या गई ११




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