व्याकरण शास्त्र का इतिहास | Vyakaran Shastra Ka Itihas
श्रेणी : इतिहास / History

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
15.93 MB
कुल पष्ठ :
385
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)समासान्त प्रकरण २८पिता मात्रा (१२-७०)
पिता का माता के साथ समास दोने पर पितृ शब्द विकल्प से दोष रहता है ।
पितरी, मात्ताधितरी ( माठा-पिता )-माता च पिता च ! इन्द्र, पितृ दाव्द शेप रहने पर
उसमें द्विविचन होगा । पक्ष में माठ्पितरी होने पर आन शऋतो० (६-२-२५) से
मातृ के ऋ को आा |
दी ५ 0
९७६. इन्द्श्र प्राणितूयसेनाज्ञानामू (२-४-२)
प्राणि, दूर्य ( वाजे ) और सेना के अंगों के वाचक दाव्दों का इन्द्र एकबचन
होता है । पाणिपादम ( हाथ-पैर )-पाणी च पादों ले 1 _समाददार अर्थ में इन्द,
एकवचन । मार्दज्ञिकवैणविकस ( सुदद्ध वजाने वाला और बंशी बजाने वाला )-
मार्दज़िकश्र वेणविकश्व । समाहार-दन्द्र, एक० । रथिकाइवारोइस (रथिक और
घुड़सवार )--रथिकाश् सशालशला सिम एक० |
९७७, झन्दाच्चुदपहान्तात् समाहारे (५-ध-१०६)
स्वर्ग अन्त चाले तथा दू पू हू अन्त बाले दन्द्व से समासान्त ट्चू ( अ ) प्रत्यय
होता है, समाहार में । ट्चू का अ थोप रहता हैं । चाऋ्त्वचम् (वाणी और स्वचा)-
वाकू व्व त्वकू च, तयोः समाहारः | इन्द्र, समासान्त टचू ( अ ) | त्वकलूजम (त्वचा
और माला )-त्वकू च खकू च, तयोः समाहारः । इन्द्र, टचू | शमीदुपदस् ( दामी
और पत्थर )-दामी च दृपद् च, तयोः समाददारः । इन्द्र, ठचू । बाक्स्विपम् ( वाणी
और कान्ति )-वाऋू च स्विदू व, तथोः समाहारः | इन्द्र, स्चू । छत्नोपानहमू ( छाता
और जता )-छत्रं च उपानदों च, तेपां समहारः | दन्दर, य्चू ( अ ) | म्रत्युदादरण--
प्रादट्डारदो ( वर्षा और शरदू )-प्राइट च शरत् च | इतरेतर इन्द्र, समाहार न होने
से टू नहीं हुआ 1
द्वन्द्द-समास समास । ,६. समासान्त-प्रकरण
९७८. ऋकपूरव्यूगपरयामानशे (५-४-७४)
तब्चू , पुर् , अप , घुर् और पथिन् डान्द समास के अन्त में हो तो समासान्त अ
प्रत्यय होता है, अक्ष ( रथचक्र का मध्यमाग ) की धघुरा अथ में घुर दब्द होगा तो
प्रत्यय नहीं होगा । जर्व्च: ( ऋचा का आधा भाग ) -- ऋचः सर्षमू । अधे०(९९८ ) से समास, इससे समासान्त अ प्रत्यय । चिप्णुपुरमू ( विष्णु की नगरी है)
“विण्णोः पूः । पष्टी तत्पुरुप, इससे समासान्त अ प्रत्यय । विमलापं सरः ( निर्मल जल
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