आंधी | Aandhi

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Aandhi by जयशंकरप्रसाद - Jaysankar Prsaad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्राधी ट् विचार करते हुए जीवन की किसी कठिनाई से टकराते रहने से भी सिर म पीड़ा दो सकती है तो भी मैं इकी सी तन्द्रा केवश तब्रियत बनाने के लिए ले दी लेता । । शर काल की उजली धूप ताल के नीले जल पर फेल रही थी | शाखों म चका्चोंधी लग रददी थी । मैं कमरे म पढ़ा श्रैगड़ाई ले रहा था | दुलारे ने झाकर कहा--ईरानी--नहों नहीं बलूची श्राये हैं ।-- मैंने पूछा--केसे ईरानी शऔर बलूची बद्दी जो मगा फीरोजा चारयारी बेचते हैं सिर म रूमात बषि हुए । मैं उठ खड़ा हुआ दालान म श्राकर देखता हूँ तो एक बीस बरस के युवक के साथ लेला गले म चमड़े का बेग पीठ पर चोटी छींट का रूमाल । एक निराला श्राकपक चित्र लेखा ने इसकर पूछा--बाबू यारयारी लोगे 1 चचारयारी हाँ बाबू चारयारी | इसके रहने से इसके पास सोना शशर्फी रदेगां। थैली कभी खात्ती न होगी श्रीर बाबू इससे चोरी का माल बहुत जद पकड़ा जाता है । साय ही युवक ने कहा--लें ली बाबू | श्रसली चारयारी. सोना का चारयारी | एक बाबू के लिए लाया था । बे मिला नहीं । मैं श्रत्र तक उन दोनों की सुरमीली श्राखों को देख रहा था । सुरभे का घेरा गोरे गोरे मद पर झाख की विस्तृत सत्ता का स्वत असाक्षी था ) पतली लंबी गदन पर खिलौने सा मैं ट्पाटप बोल रहा था मैंने कहदा--मुक्ते तो चारयारी नदीं चाहिए | किन्तु वददा सुनता कौन है. दोनों सीढी पर बेठ गये थे श्ौर लेता अपना वेग खोल रही थी । कई पो हियाँ निकलीं सइसा लैला के मदद




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