पद्मपुराण भाषा [चतुर्थ पतालखण्ड] | Padmapuran Bhasha [chaturth Patal Khand]

Padmapuran Bhasha [chaturth Patal Khand] by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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. _._....... प्मपुराण भाषा पाताउखएड च० । ( क्योकि रामचन्द्रजी के युगलचरणों के ग्रहण करने में उनकी बाएं आसक्क द्ोगई थीं ३१ भरतजी बोले कि हे श्रीरामचन्द्र मद्दाबाहु करुणासागर करुणापुव्वेंक.दुराचारी दुष्ट मुझ पापी के ऊपर कृपा ' करो ३२ क्योंकि जो आपके चरण जानकी जीके कर कमलों के स्पर्श को भी कर सममते थे वे आपके चरण कमल इंमारे लिये वनमें स्रमण करते फिरे ६३ ऐसा कद्कर आौँश नेत्रों से.छोड़तेहुये दीन मुख भरतजी बार, ९:रामचन्द्रजी को छपटकर फिर हर्ष से विज्वठ मुख होकर हाथ जोड़कर, आंगे खड़े होरहें ३४ व श्ीरघनाथ कृपा निधिने उन अपने छोटेभाई भरतजीको अच्छे प्रकार मेंटकर महा मन्त्री च गुरुदेव वर्सिछादिकों के प्रणाम किया व' आदर से सबोंकां कुशल पूँढा ३५ फिर भरत सहित पुष्पक विमानपर चढ़े तब भरत जीने अपने भ्राताकी निन्दा रद्वित पत्नी सीताजी को देखा ३६ व अत्रिकी . पत्नी अनसुया और .अगस्त्थकी भाय्यांछो पामुद्दाके, समान पतिवत्ञा माना और प्रणाम किया ३७ व कहा कि हे .मातः ! मेरे पा्ोंको क्षमा करो क्योंकि मुझ दुष्दत्तकारी ने बड़ा.'पाप किया जो. तुमसी सबको झुमकरनेवाली पतित्रता को ऐसा दुःख दिलाया ३८ महा भाग्यवती जानकीजीने भी देवरको देख आदर सहित आ- -शीर्बवाद देकर भरतजीकी अनामये पँछी ३९. सब ठोग विमानमें स- वार-झाकाशमागेसे क्षणमात्रम पासही पिताकी पुरीकों देखतेमये ॥ ची ० क्षणयकसक बिमान बिराजे । अन्तरिन्षमदअति सबन्नाजे ॥ ' 'देखतरहें अयोध्यानगरी । दर्षित बहुविधिसोसो सगरी १1४ ०॥ ... ८. ड्रति श्रीपदापुराणेपाताठखण्डेरामाश्वमेघेसाषानुवादेशषवास्र्यायन , श्र _ सँब्वादेराजघानीदशनोनामदितीयो5ध्यायः ॥ २ ॥ तीसरा अध्याय :दो० । कह्यो ततीयाध्यायमहँ पुरप्रवेश .जिमि राम ॥ : कीन सकल परिजन सहित सब विधि पूरणकाम ॥ 9 ', , शषनागजी ,बात्स्यायनमुनि. से बोंठे कि श्रीरामचन्द्रंजी अपन लोगेंकि बसनवाली राजधानी को देखकर बहुत दर्षित हुये क्योंकि नहुत दिनोंसे उसके देखनेकी छालसा. लगरदीथी 3 त्र भरतजाने




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