रत्नभण्डार अर्थात ज्ञान रामायण | Ratna Bhandar Arthat Gyan Ramayan

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : रत्नभण्डार अर्थात ज्ञान रामायण - Ratna Bhandar Arthat Gyan Ramayan
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about चिरुमनलाल जी वैश्य - Chirumanlal Ji Vaishya

Add Infomation AboutChirumanlal Ji Vaishya

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
झानरामायण ( श्प सजुप्य शरीरका महत्वसोतज्ु घरि हरि भजह्टि नजेनर 1 दोईं विपय रतिमन्द मम्द तर 11 कांच किराच चदलि शठलेद्दी । करते डारि परस मणिदेंढी ॥ रतन पाइ विपय भ्न देहीं । पलटि सुघाते शट चिपलेदीं ॥ __. जो सन्ुप्य शरीर पाफर इंशवर सजन न फर विपयोमें सन लगाते हैं चहद मन्द, घुद्धि पारस मणि के घद्ले कांच को सरोदते 'पथया झस्त देकर चिप उदरण करते हैं 1शिक्ता-सजष्य शरीर को पाकर श्र .कर्म करना ही जीयनका साफल्य है ||2 जलफ़ भर छु




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now