कथा संकलन - शिवराज आनंद | Katha Sankalan - Shivraj Anand

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Katha Sankalan by शिवराज आनन्द - Shivraj Anand

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

शिवराज आनन्द - Shivraj Anand

साहित्यिक नाम- शिवराज आनंद
मूल नाम - शिव कुमार साहू।
माता - श्रीमती पार्वती साहू ,
पिता - श्री विश्वनाथ साहू।
जन्म - 1987 में सूरजपुर एवं रामानुज नगर के सीमावर्ती क्षेत्र ग्राम सोनपुर के एक कृषक परिवार में । आपको हिंदी बहुत ही प्रिय है। आप साहित्य प्रेमी हैं।

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मेरे जीने की आस जिंदगी से कोसो दूर चली गयी थी कि अब मेरा कौन है ? मैं किसके लिए अपना आँचल पसारुंगा ? पर देखा-लोक-लोचन में असीम वेदना ... तब मेरा ह्रदय मर्मान्तक हो गया , फिर मुझे ख्याल आया ...अब मुझे जीना होगा , हाँ अपने स्वार्थ के लिए न सही... परमार्थ के लिए ही । मैं ज़माने का निकृष्ट था तब देखा उस सूर्य को कि वह निःस्वार्थ भाव से कालिमा में लालिमा फैला रहा है ... तो क्यों न मैं भी उसके सदृश बनूं . भलामानुष वन सुप्त मनुष्यत्व को जागृत करुं। मैं शैने-शैने सदमानुष के आँखों से देखा-लोग असहा दर्द से विकल है उनपर ग़मों व दर्दों का पहाड़ टूट पड़ा है और चक्षुजल ही जलधि बन पड़ी हैं फिर तो मैं एक पल के लिए विस्मित हो गया ... मेरा कलेजा मुंह को आने लगा...परन्तु दुसरे क्षण वही कलेजा ठंडा होता गया और मैंने चक्षुजल से बने जलधि को रोक दिया .. क्योंकि तब तक मैं भी दुनिया का एक अंश बन गया था . जब तक मेरी सांसें चली.. तब तक मैं उनके लिए आँचल पसारा ...... किन्तु अब मेरी साँसे लड़खड़ाने लगी हैं , जो मैंने उठाए थे ग़मों व दर्दों के पहाड़ से भार को वह पुनः गिरने लगा है .




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