हिंदी के कृष्ण भक्ति कालीन साहित्य में संगीत | Hindi Ke Krisna Bhakti Kalin Sahithya Main Sangeet

Hindi Ke Krisna Bhakti Kalin Sahithya Main Sangeet by उषा गुप्ता - Usha Gupta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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॥ वह विलासिता का उपकरण बनने की ओर उन्मुख हुआ । इसी युग में सर्वाधिक लोकनृत्य निर्मित हुए और भारतीय संगीत विदेशों में पहुँचा । जैन-युग में संगीत की पृष्ठभूमि क्रातिपूर्ण लहरों से तरगाथमान हुई । ब्राह्मणों का एकाधिपत्य समाप्त होकर संगीत के द्वार मानव मात्र के लिए उन्मुक्त हो गये । सत्य पवित्रता सौदर्य अहिसा और अस्तेय--मानव जीवन के ये पाँच आधार ही संगीत के स्तम्भ बने और पचशील कहलायें । सर्वसाधारण का सामान्य संगीत भी सपुष्ट संगीत के मेल में आया । बोद्ध-काल में सगीत मानव मात्र के कल्याणार्थ अग्रसर हुआ । इस युग न अनेक सुप्रसिद्ध सगीतज नारियों को प्रसुत किया । दिव्य सगीत इस युग की अपरिमेय शक्ति बना । बुद्ध के पावन सिद्धान्तों पर आधारित संगीत नैतिकता से पुणे होकर अपने वाह्म और आन्त- रिक शक्तिशाली रूपो से समत्वित होकर कला के क्षेत्र में अपना एक चिह्न विशेष छोड़ गया । मौये-युग मे सगीत अपनी नैतिक मर्यादा से किचित च्युत होने लगा । लोक संगीत ने अधिक प्रसार पाया । यूनानी भारतीय कला के प्रशासक बने । संगीत के आध्यात्मिक सौदर्य का पुनरुत्थान हुआ और उसका आदर्श पूर्ण सदेश विदेशों मे ध्वनित हुआ । दुग-काल मे ब्राह्मण पुन संगीत पर अपना एकाधिकार करने को सचेष्ट हुए । गरवा-नृत्य इसी युग का वरदान है परन्तु कोई विशेष प्रगति न होने के कारण इस युग को संगीत की दृष्टि से अवरुद्ध काल की संज्ञा मिली । कनिष्क-युग में सगीत की सावंभौमिकता पुन. प्रतिष्ठित हुई और विश्व वधुत्व की भावना का उल्लेखनीय विकास हुआ । यहाँ का संगीत रोम मध्य एशिया और चीन में पहुँचा और इस क्षेत्र मे भारत गौरवान्वित हुआ । अद्वघोष ने संगीत को दाशंनिक मोड़ दिया । इस युग में प्रथम बार संगीत का वैज्ञानिक विवेचन हुआ और यह भारतीय संगीत का नवीन प्रभात था । नृत्य प्रवीण अनन्य सुन्दरी नाग कन्याओं ने नाग-युग में विधानपूर्ण संगीत की अभिवृद्धि की । हिन्दू सस्कृति के जागरण वाले गुप्त-काल में शास्त्रीय संगीत विहित हुआ । एक लासन सूत्र मे आवद्ध भारत के संगीत प्रेमी गुप्त सम्राटो के समय कालिदास और भास की चतुर्मुखी प्रतिभाओ ने संगीत को गौरव प्रदान करके इस काल को संगीत का स्वर्ण-युग बना दिया । हुष-युग में मतग और वाणभट्ट सरीखें कलाकार उद्भूत हुए और संगीत ने जनवादी दृष्टिकोण अपनाया ।




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