आगरा व फ़तेहपुर सीकरी के ऐतिहासिक भवन | Agra and Fatehpur Sikri of Etihasik bhawan

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Agra and Fatehpur Sikri of Etihasik bhawan by देवीदयाल माथुर - Devidayal Mathur
लेखक :
पुस्तक का साइज़ : 6.98 MB
कुल पृष्ठ : 92
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देवीदयाल माथुर - Devidayal Mathur

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ऐतिहासिक परिचय तिहास के माध्यमिक काल में उस समय को सम्यता के श्रासन तथा केन्द्र होने के कारण झ्ागरा व झ दिल्‍ली भारत के हृदय थे । वे हिन्दू-मुस्लिम-संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली स्थापत्य-कला के दुष्टि- कोण से सब से अधिक समृद्ध हें और प्राचीनता सौंदर्य तथा ऐतिहासिक रुचि से पूर्ण हैं । जिस जमना नदी को लेकर इतनी लोककथाएं प्रचलित हैं उसी के किनारे पर बसें हुए ये दोनों नगर एक दूसरे से सौ मील से कुछ ही श्रधिक श्रन्तर पर हें। दोनों ही में वे सुन्दर भवन हमारे लिए सुरक्षित हैं जो अपनी स्थापत्य-कला सादगी श्रौर सुरुचिपुर्ण प्रणाली के लिए प्रसिद्ध हैं । प्रेरणा से भरे हुए कलाकारों श्रौर निर्माताओं ने ्रपने प्यारे हाथों से श्रागरा में ताजमहल का निर्माण किया । हिन्दू-मस्लिम कला ने भारत को एक ऐसा सांस्कृतिक स्थायित्व प्रदान किया हैं जो दताब्दियों से अटूट चला श्र रहा है । हिन्दू लोककथाग्रों के भ्रनुसार कहा जाता हैं कि श्रागरा वह क्षेत्र हैं जहाँ हमारे गौरवपुर्ण भ्रतीत के यथार्थ विश्वकोण महाभारत के रचयिता प्रसिद्ध ऋषि वेदव्यास का जन्म हुआ था । वह कवि होने के साथ- साथ शिक्षक भी थे । परशुराम के रूप में विष्णु भगवान के भ्रवतार लेने का स्थान माने जाने के कारण आ्रागरा के प्रति हिन्दुओं की श्रगाध श्रद्धा है। श्रीकृष्ण के पवित्र बृजमंडल के श्रनेक क्षेत्रों में से आ्रागरा प्रथम था और कहा जाता हैं कि यहीं पर वह दैवी ग्वाला श्रपनी बन्झी बजाता हुआ उस श्रपूर्व संगीत की रचना करता हुमा विचरण किया करता था जो सभी सुनने वालों को श्राकर्षित व मोहित कर लेता था । जिले में स्थित कुछ प्राचीन निवास-स्थानों के अवशेषों से प्रागरा की प्राचीनता की साक्षी मिलती हैं बटेडवर जिसे सूरजपुर के नाम से भी पुकारते हैं राजा शूरसेन के द्वारा बसाया गया था । जनरल कनिंघम ने राजा श्रसेन को श्रयोध्या के सूर्यवंदीय शासन के सर्वेसर्वा श्री रामचन्द्र का भतीजा बताया हैं। इसके मन्दिरों के खंडहरों में पत्थर की प्रतिमाएं मिली हैं श्रौर ऐतमादपुर तथा चम्बल नदी के किनारे वाले स्थानों में बौद्काल की रचना्रों के भ्रवशेष पाए गए हैं इसमें कोई सन्देह नहीं कि इसी प्रकार के प्राचीन स्थान कभी उन दाक्तिशाली राज्यों के भाग रहे हैं जिनकी राजधानी मथुरा थी । कहा जाता है कि सन्‌ १०२२ में सुलतान महमूद ने श्रागरा पर श्राक्रमण किया ब्रौर इस सीमा तक उसको लूटा श्रौर उसका विनाश किया कि उसने एक महत्वहीन गांव का रूप लें लिया महमूद के पलायन के बाद उस समय तक वह फिर हिन्दुओं के भ्रधिकार में रहा जब तक कि पठान राजाओं का उदय हुआ । गुलाम खिलजी तुगलक तथा सैयदों के शासन के ्राघीन रहते हुए कभी तो इस पर झक्रमणकारियों का अधिकार होता रहा श्र कभी यह श्रद्धस्वाधीनता का उपभोग करता रहा । आगरा में बादलगढ़ का किला सिकन्दर लोदी के सम्मुख नत हो गया श्रौर उसने १५०५ में इसके निकट एक श्रन्य राजधानी का निर्माण किया जिसे मेहतर मलला खां के भ्रनुसार श्रागेराह कहा जाता था । श्रागे चल कर इसे एक भ्रलग जिले का रूप दे दिया गया जो उन ५२ जिलों में से एक था । जो बयाना के क्षेत्र के भ्रन्तर्गत थे ।




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