गोदान | Godan

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प्रेमचंद का जन्म ३१ जुलाई १८८० को वाराणसी जिले (उत्तर प्रदेश) के लमही गाँव में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम आनन्दी देवी तथा पिता का नाम मुंशी अजायबराय था जो लमही में डाकमुंशी थे। प्रेमचंद की आरंभिक…

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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गो-दान श्डे पुरानी मसल झूठी थोड़ी है --बिन घरनी घर भूत का डेरा। कहीं सगाई नहीं ठीक कर लेते ? ताक में हूँ महतो पर कोई जल्दी फंसता नहीं । सौ-पचास खरच करनें को भी तैयार हुं। जैसी भगवान की इच्छा । अब में भी फिकर में रहेंगा। भगवान चाहेंगे तो जल्दी घर बस जायगा। बस यही समझ लो कि उबर जाऊंगा भेया घर में खाने को भगवान का दिया बहुत है। चार पसेरी रोज दूध हो जाता है लेकिन किस काम का। मेरे ससुराल में एक मेहरिया हैं। तीन-चार साल हुए उसका आदमी उसे छोड़- कर कलकत्ते चला गया। बेचारी पिसाई करके गुजर कर रही है। वाल-ब्रच्चा भी कोई नहीं । देखने-सुनने में अच्छी हैं। वस लच्छमी समझ लो । भोला का सिकुड़ा हुआ चेहरा जैसे चिकना गया । आशा में कितनी सुधा ह। बोला--अब तो तुम्हारा ही आसरा है महतो छट्टी हो तो चलो एक दिन देख आये मैं ठीक-ठाक करके तब तुमसे कहूँगा । बहुत उतावली करने से भी काम विगड़ जाता है । जब तुम्हारी इच्छा हो तब चलो। उतावली काहे की । इस कबरी पर मन ललचाया हो तो ले लो। यह गाय मेरे मान की नहीं है दादा। में तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाना चाहता । अपना धरम यह नहीं हैं कि मित्रों का गला दबायें । जैसे इतने दिन बीते हैँ वैसे और भी बीत जायेंगे । तुम तो ऐसी बातें करते हो होरी जैसे हम-तुम दो है। तुम गाय ले जाओ दाम जो चाहे देना । जैसे मेरे घर रही वैसे तुम्हारे घर रही । अस्सी रुपए में ली थी तुम अस्सी रुपए ही दे देना। जाओ । ठेकिन मेरे पास नगद नहीं है दादा समझ लो । तो तुमसे नगद माँगता कौन है भाई होरी की छाती गज़-भर की हो गयी । अस्सी रुपए में गाय मेंहगी न थी । ऐसा अच्छा डील-डौल दोनों जून में छः-सात सेर दूध सीधी ऐसी कि बच्चा भी दुद्द ले। इसका तो एक-एक बाछा सौ-सौ का होगा। द्वार पर बेँघेगी तो द्वार की झोभा बढ़ जायगी । उसे अभी कोई चार सौ रुपए देने थे लेकिन उधार को वह एक तरह से मुफ्त समझता था। कहीं भोला की सगाई ठीक हो गयी तो साल दो साल तो वह बोलेगा भी नहीं । सगाई न भी हुई तो होरी का क्या बिगड़ता है। यही तो होगा भोला बार-बार तगादा करने आयेगा बिगड़ेगा गालियाँ देगा। लेकिन होरी को इसकी ज्यादा शर्म न थी। इस व्यवहार का वह आदी था । कृषक के जीवन का तो यह प्रसाद हैं। भोला के साथ वह छल कर रहा था और यह व्यापार उसकी मर्यादा के अनुकूल था। अब भी लेन-देन में उसके लिए लिखा-पढ़ी होने और न होने में कोई कं €६ अन्तर न था। सुखे-बूड़े की विपदाएँ उसके मन को भीरु बनाये रहती थीं। ईश्वर का




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