वीर काव्य | Veer Kavya

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Veer Kavya by उदयनारायण तिवारी - Udaynarayan Tiwari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(४०) ब्रह्माण के मुख की कविता कछठ भाट लई कछु चारण लीन्हीं । यह जानना आवश्यक है कि चारणों की श्रधानता कब से हुई ? कोई शिलालेख या ताम्रपत्र संस्कृत में या पुराना अब तक नहीं मिला हैं जिसमें चारणो या भाटों को भूमिदान का उल्लेख हो | सुभाषित हारावली नासक एक सुभाषित ज्छोको का संत्रह हरि कवि का किया हुआ है पीट्सन दूसरी रिपोर्ट प्र० ४७-६४ । उसमे मुरारो कवि के नाम से यह श्होक दिया हुआ है -- चर्चामिश्चारणानां क्षिति रमण परां प्राव्य संमोदुल्नी द्लाँ मा कीते सौ विद्क्ला नवगणुय कवि प्रात (?) वाणी विलासान्‌ । गीत ख्यात न. नारा. किमपि रघप्तेरथ यावत्प्सादा-- द्वाइ्मीकेरेव धात्रीं. घवलयति यशों मुद्रया रामभद्रः । ऊपर के इलोक के द्वितीय चरण में कबि श्रात ?] बाजी विलासन पाठ अशुद्ध है । बस्तुतः शुद्ध पाठ होगा कबिश्रोत वाणीविलासान या कवोन्‌ प्राप्त बाणी विलासान | इस श्लोक का भाव इस प्रकार है -- कोई राज्ञा चारणों की कविता से प्रसन्न होकर संस्कृत कवियों का अनादर करने लगा । उसे कब्रिं सम्बोधित करके कहता है कि हे महदीपाल चारणों की चर्चाओ से बड़ा आनन्द पाकर कवियों की रचनाओं का अनादर मत कीजिए क्यों कि वे कीर्तिरूपी नायिका के रखवारे या लाकर राजाओं से उसे मिलाने वाले है । देखिए रामचन्द्र का एक गीति या ख्यात नाम को भी नही है वाल्मीकि ही की कृपा से आज तक रामभद्र अपने यश की छाप से प्थ्वरी को अलंकृत कर रहे हैं । भाव यह है कि चारणों के देश भाषा के गीत और ख्यात




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